MP Liquor Policy 2026-27 : 650 शराब दुकानों को अब तक नहीं मिले खरीदार, अब 30% डिस्काउंट पर मिलेंगे ठेके
मध्य प्रदेश में शराब दुकानों की नीलामी का 12वां दौर शुरू हो गया है। 650 दुकानों के खाली रहने के बाद सरकार ने नियमों में बदलाव कर ठेकेदारों को 30% तक की छूट दी है।
MP Liquor Policy 2026-27 : मध्य प्रदेश में 1 अप्रैल से शराब के नए ठेके तो शुरू हो गए हैं, लेकिन सरकार के लिए राहत की बात अभी पूरी तरह नहीं आई है। प्रदेश की नई आबकारी नीति के तहत अब भी करीब 650 शराब दुकानें और समूह ऐसे हैं, जिन्हें खरीदने के लिए कोई ठेकेदार आगे नहीं आया है।
आबकारी विभाग ने राजस्व के नुकसान को बचाने के लिए अब 12वें दौर की नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिसमें नियमों को थोड़ा आसान बनाया गया है। विभाग का लक्ष्य साल भर का करीब 19,952 करोड़ रुपए का राजस्व जुटाना है, जिसमें से अभी 5,080 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार करना बाकी है।
नीलामी के 11वें दौर में क्या रहा हाल?
हाल ही में विभाग ने 11वें दौर की नीलामी आयोजित की थी, लेकिन इसके नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। इस दौर में कुल 21 शराब दुकानों की नीलामी हुई, जिनसे विभाग को 130.97 करोड़ रुपए मिले। गौर करने वाली बात यह है कि इन दुकानों की सरकारी तय कीमत (रिजर्व प्राइस) 150.60 करोड़ रुपए थी। यानी ठेकेदारों ने इन दुकानों को खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई और बोली रिजर्व प्राइस से भी कम लगी।
विभाग ने उन प्रस्तावों को फिलहाल रोक दिया है जिन्होंने तय कीमत से 20 प्रतिशत से भी कम की बोली लगाई थी। सरकार अगले एक-दो दिनों में इन पर फैसला लेगी कि इन्हें इसी दाम पर देना है या फिर से नई प्रक्रिया अपनानी है।
जिन इलाकों में दुकानें नीलाम नहीं हो सकी हैं, वहां सरकार ने एक अस्थाई व्यवस्था की है। वहां आबकारी विभाग का स्टाफ खुद शराब की बिक्री कर रहा है ताकि सरकार की कमाई पर बुरा असर न पड़े।
12वें दौर के लिए नियम बदले, अब ई-टेंडर का सहारा
650 दुकानों के खाली रहने के बाद अब विभाग ने 12वें दौर की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस बार विभाग ने एक बड़ा बदलाव किया है। अब दुकानों की नीलामी के लिए बोली (ऑक्शन) नहीं लगेगी, बल्कि केवल ई-टेंडर के जरिए ही आवेदन लिए जाएंगे। इसके साथ ही ‘बीओक्यू’ (BOQ) की शर्त को दोबारा लागू कर दिया गया है। इस नियम के आने से अब ठेकेदारों को एक बड़ी राहत मिली है।
नए नियमों के मुताबिक, ठेकेदार अब रिजर्व प्राइस से 30 प्रतिशत कम तक का ऑफर दे सकते हैं। इससे पहले के कुछ राउंड में यह छूट हटा दी गई थी, जिसकी वजह से ठेकेदार पीछे हट रहे थे क्योंकि उन्हें महंगी दुकानों में घाटे का डर था। हालांकि, विभाग ने यह भी साफ कर दिया है कि 70 प्रतिशत से कम की किसी भी बोली को स्वीकार नहीं किया जाएगा। यानी कम से कम 70 फीसदी कीमत तो सरकार को चाहिए ही।
आबकारी आयुक्त के सख्त निर्देश और राजस्व की चुनौती
आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना ने सभी जिला अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि 10वें और 11वें दौर में जिन ठेकेदारों ने रिजर्व प्राइस का 80 प्रतिशत या उससे अधिक का ऑफर दिया है, उन्हें मंजूरी देने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
जो ऑफर 80 प्रतिशत से कम हैं, उन्हें फिलहाल होल्ड पर रखा गया है। ऐसे आवेदकों को दोबारा से सुरक्षा राशि (EMD) जमा करने की जरूरत नहीं होगी, वे पुरानी राशि के आधार पर ही प्रक्रिया में बने रह सकते हैं।
विभाग का कहना है कि वे राजस्व का संतुलन बनाए रखने के लिए दुकानों के समूहों का पुनर्गठन भी कर रहे हैं। जिन जिलों में कुल रिजर्व प्राइस 200 करोड़ रुपए से ज्यादा है, वहां किसी भी एक समूह की कीमत पूरे जिले की कीमत के 20 प्रतिशत से अधिक नहीं रखी जाएगी। इसका मतलब है कि छोटे ठेकेदारों को भी मौका मिल सके और कोई एक ही व्यक्ति पूरे जिले के बाजार पर कब्जा न कर सके।
लक्ष्य अब भी दूर
अगर हम अब तक की कमाई पर नजर डालें, तो 29 मार्च तक करीब 1200 समूहों की नीलामी पूरी हो चुकी है। इससे सरकार को लगभग 15,409.94 करोड़ रुपए का राजस्व मिलना तय हो गया है। यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले 24.34 प्रतिशत ज्यादा है, जो विभाग के लिए एक अच्छी खबर है। लेकिन असली चुनौती कुल लक्ष्य को हासिल करने की है।
साल 2026-27 के लिए सरकार ने 19,952.89 करोड़ रुपए कमाने का लक्ष्य रखा है। अभी तक विभाग ने इस लक्ष्य का करीब 77 प्रतिशत हिस्सा ही हासिल किया है। 3 अप्रैल को होने वाली 12वें दौर की ई-टेंडरिंग प्रक्रिया बहुत अहम है।
इसके लिए 3 अप्रैल दोपहर 2 बजे तक आवेदन भरे जा सकते हैं और उसी दिन दोपहर बाद टेंडर खोल दिए जाएंगे। विभाग को उम्मीद है कि 30 प्रतिशत की छूट वाली नई शर्त के बाद ठेकेदार बची हुई दुकानों को लेने में रुचि दिखाएंगे और सरकारी खजाने की भरपाई हो सकेगी।













