IRS अफसर की 40 लाख की रिश्वतखोरी पकड़ी गई, फिर भी अदालत ने गिरफ्तारी को बताया गैरकानूनी
CBI bribery case : सरकारी दफ्तरों में बैठकर आम आदमी से पैसे ऐंठने वाले अफसरों की कहानी हर राज्य में मिल जाती है, लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग मोड़ ले गया। महाराष्ट्र के रायगढ़ में तैनात एक बड़े टैक्स अफसर को रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया, जांच एजेंसी ने पूरा मामला सुलझा हुआ बताया, और फिर अदालत ने ही पूरी गिरफ्तारी को गलत करार दे दिया।
मध्य प्रदेश के व्यापारियों और छोटे कारोबारियों के लिए यह खबर इसलिए मायने रखती है क्योंकि जीएसटी और टैक्स से जुड़ी परेशानियां हर राज्य में एक जैसी हैं। रिश्वत मांगने का तरीका, दफ्तर की भाषा, और आम आदमी की मजबूरी लगभग हर जगह मिलती-जुलती दिखती है।
पूरा मामला क्या है
सीबीआई ने एडिशनल कमिश्नर, सेंट्रल जीएसटी, विनय कुमार कन्हेटी को गिरफ्तार किया है। ये अधिकारी 2009 बैच के आईआरएस अफसर हैं और महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में तैनात थे। इनके साथ सीजीएसटी सुपरिटेंडेंट राकेश कुमार सिन्हा और एक निजी व्यक्ति नरिंदर राजपूत को भी पकड़ा गया।
मामला शुरू हुआ 26 अगस्त को, जब सीबीआई ने सुपरिटेंडेंट राकेश कुमार सिन्हा के खिलाफ केस दर्ज किया। शिकायत करने वाले की एक स्टोन-क्वारी यानी पत्थर खनन कंपनी थी, जिसका जीएसटी और रॉयल्टी से जुड़ा मामला अफसरों के पास लंबित था। आरोप है कि इसे निपटाने के बदले 1.5 करोड़ रुपये की मांग की गई थी।
बातचीत के बाद यह रकम घटकर 40 लाख रुपये पर आ गई। योजना यह बनी कि पैसा सीधे अफसरों के पास नहीं, बल्कि एक निजी व्यक्ति के जरिए पहुंचाया जाएगा।
रंगे हाथ पकड़ा गया आरोपी
सीबीआई ने पूरी योजना बनाकर जाल बिछाया और जैसे ही निजी व्यक्ति ने 40 लाख रुपये की रकम स्वीकार की, टीम ने उसे रंगे हाथ पकड़ लिया। पूछताछ में सुपरिटेंडेंट सिन्हा और अफसर कन्हेटी दोनों ने रिश्वत की रकम मिलने की बात स्वीकार कर ली।
इसके बाद जब आरोपियों के घरों और ठिकानों पर तलाशी ली गई, तो करीब 43 लाख रुपये नकद और लगभग 90 लाख रुपये के जेवरात बरामद हुए। यह रकम बताती है कि मामला सिर्फ एक बार की रिश्वत तक सीमित नहीं था।
अदालत ने क्यों कहा गिरफ्तारी गैरकानूनी
यहीं से कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है। थाणे की विशेष अदालत में जब सीबीआई ने आरोपियों को और हिरासत में रखने की मांग की, तो अदालत ने इसे खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक नहीं की गई।
बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के दो अहम फैसलों का हवाला दिया, विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य और मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य। इन फैसलों में साफ कहा गया है कि गिरफ्तारी की वजह आरोपी को समझाकर बतानी जरूरी है, और मजिस्ट्रेट का यह दायित्व है कि वह गिरफ्तारी की वैधता की जांच करे।
अदालत ने गिरफ्तारी मेमो और केस डायरी की जांच के बाद पाया कि आरोपियों को गिरफ्तारी की वजह ठीक से समझाई ही नहीं गई थी। साथ ही, परिजनों को भी लिखित रूप में सूचना नहीं दी गई, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है।
कोर्ट ने यह भी माना कि आगे हिरासत में रखने की कोई ठोस वजह नहीं बनती, क्योंकि रिश्वत की रकम पहले ही जब्त हो चुकी थी और मोबाइल फोन भी बरामद कर लिए गए थे।
तीनों आरोपियों को मिली जमानत
अदालत ने तीनों आरोपियों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। हर आरोपी को 15 हजार रुपये के पर्सनल बॉन्ड पर और उतनी ही राशि की जमानत पर रिहा किया गया। साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब भी जांच एजेंसी बुलाए, तीनों को जांच में सहयोग करना होगा।
