इंदौर में बड़ा एक्शन: प्रशासन ने वापस ली क्रिश्चियन कॉलेज की 400 करोड़ की जमीन
इंदौर प्रशासन ने क्रिश्चियन कॉलेज की 400 करोड़ की जमीन सरकारी घोषित की। लीज शर्तों के उल्लंघन और अस्पताल बंद होने पर कलेक्टर ने कब्जा लेने के आदेश दिए हैं।
Indore Christian College Land Case : इंदौर के जूनी इंदौर इलाके से एक बड़ी खबर सामने आई है। जिला प्रशासन ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए क्रिश्चियन कॉलेज की करीब 400 करोड़ रुपये की बेशकीमती जमीन को सरकारी घोषित कर दिया है। यह मामला सालों से कानूनी दांव-पेच में फंसा हुआ था, लेकिन अब कलेक्टर के इस कड़े फैसले ने शहर के प्रशासनिक और शिक्षा जगत में हलचल मचा दी है।
लीज की शर्तों का उल्लंघन पड़ा भारी
इंदौर जिला प्रशासन की इस कार्रवाई के पीछे सबसे बड़ी वजह लीज की शर्तों का पालन न करना है। दरअसल, यह जमीन बहुत पहले जिस खास मकसद के लिए दी गई थी, उस पर अब काम नहीं हो रहा था। कलेक्टर शिवम वर्मा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए शुक्रवार को आधिकारिक आदेश जारी किए।
इस आदेश के बाद अब यह पूरी जमीन मध्य प्रदेश शासन के नाम हो जाएगी। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जब सरकारी जमीन किसी विशेष सामाजिक कार्य के लिए दी जाती है और वह काम बंद हो जाए, तो जमीन वापस सरकार के पास लौट आती है।
कब्जे के लिए तीन दिन की समयसीमा तय
कलेक्टर का आदेश मिलते ही प्रशासनिक अमला पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। जूनी इंदौर के तहसीलदार को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे अगले तीन दिनों के भीतर इस पूरी जमीन का भौतिक कब्जा हासिल करें। कब्जा लेने की यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद तहसीलदार को अपनी रिपोर्ट जिला प्रशासन को सौंपनी होगी। इस कदम से यह साफ हो गया है कि प्रशासन अब इस मामले में और देरी करने के मूड में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
इस मामले में कॉलेज प्रबंधन ने कानून की हर मुमकिन शरण ली थी। यह विवाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से होता हुआ देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। हालांकि, प्रबंधन को कहीं से भी राहत नहीं मिल सकी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया था कि जमीन की लीज से जुड़े मामलों में अंतिम फैसला लेने का अधिकार जिला कलेक्टर के पास है। इसी कानूनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए प्रशासन ने गहन जांच की और अंततः जमीन को वापस लेने का फैसला किया।
1887 में शुरू हुई थी इस जमीन की कहानी
रिकॉर्ड्स के मुताबिक, इस जमीन की कहानी 135 साल से भी ज्यादा पुरानी है। साल 1887 में यह जमीन एक महिला अस्पताल और स्कूल चलाने के लिए लीज पर दी गई थी। लंबे समय तक यहां संस्थान चले, लेकिन हालिया जांच में चौंकाने वाली बातें सामने आईं। जांच में पता चला कि जिस महिला अस्पताल के नाम पर यह जमीन आवंटित थी, वह सालों पहले बंद हो चुका है। इसके अलावा, कॉलेज भी पूरी जमीन के बजाय केवल एक छोटे से हिस्से में चल रहा था।
व्यावसायिक इस्तेमाल की कोशिश बनी मुख्य वजह
प्रशासन को अपनी जांच में यह भी पता चला कि इस कीमती जमीन के एक बड़े हिस्से पर व्यावसायिक गतिविधियां शुरू करने की तैयारी चल रही थी। चूंकि लीज की शर्तों में व्यावसायिक इस्तेमाल की अनुमति नहीं थी, इसलिए इसे नियमों का सीधा उल्लंघन माना गया। इसी आधार पर प्रशासन ने जमीन को राजसात करने की प्रक्रिया शुरू की। इंदौर का यह फैसला अब पूरे प्रदेश के लिए एक नजीर बन गया है कि सरकारी जमीन का दुरुपयोग किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।











