Kuno National Park : कूनो नेशनल पार्क में 9 नए चीतों की एंट्री के साथ भारत में इनकी संख्या 48 पहुंची। जानिए ‘प्रोजेक्ट चीता’ का ताजा अपडेट
‘प्रोजेक्ट चीता’ के तहत तीसरा बड़ा ट्रांसलोकेशन; 6 मादा और 3 नर को क्वारंटाइन बाड़ों में रखा गया
Kuno National Park : मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले स्थित कूनो नेशनल पार्क में शनिवार को वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक और अहम कदम दर्ज हुआ। अफ्रीकी देश बोत्सवाना से लाए गए 9 अफ्रीकी चीतों को औपचारिक रूप से पार्क के क्वारंटाइन बाड़ों में छोड़ दिया गया। यह ट्रांसलोकेशन ‘प्रोजेक्ट चीता’ के तहत किया गया, जिसका उद्देश्य भारत में विलुप्त हो चुके चीता प्रजाति को फिर से बसाना है।
इन 9 चीतों में 6 मादा और 3 नर शामिल हैं। इनके आगमन के साथ देश में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 48 हो गई है। अधिकारियों के अनुसार, नए चीतों को एक महीने तक निगरानी और स्वास्थ्य परीक्षण के बाद ही बड़े बाड़े में छोड़ा जाएगा।
कैसे और कब पहुंचे भारत?
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, चीतों का विशेष विमान शुक्रवार रात भारतीय वायुसेना के सहयोग से ग्वालियर एयरफोर्स स्टेशन पर उतरा। वहां विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों और वन्यजीव विशेषज्ञों की टीम ने प्रारंभिक स्वास्थ्य जांच की।
अगली सुबह करीब 8:30 बजे भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों के जरिए चीतों को कूनो नेशनल पार्क पहुंचाया गया। सुरक्षित लैंडिंग के लिए पार्क परिसर में अस्थायी हेलीपैड तैयार किए गए थे। सुबह लगभग 9:30 बजे तक सभी चीतों को निर्धारित क्वारंटाइन बाड़ों में शिफ्ट कर दिया गया।
केंद्रीय मंत्री ने किया स्वागत
केंद्रीय वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कूनो पहुंचकर चीतों को क्वारंटाइन बाड़ों में छोड़ा। मंत्रालय ने इसे संरक्षण प्रयासों की निरंतरता बताया है।
सरकार का कहना है कि यह पहल केवल संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक पारिस्थितिक संतुलन स्थापित करने की रणनीति का हिस्सा है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में चीते 1952 में आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित कर दिए गए थे। ऐसे में उनका पुनर्वास एक जटिल और दीर्घकालिक प्रक्रिया है।
अब तक की स्थिति: 48 तक पहुंची संख्या
नए 9 चीतों के आगमन के बाद देश में कुल 48 चीते दर्ज किए गए हैं। इनमें से 28 चीते भारत में ही जन्मे शावक हैं, जो कूनो में पहले से मौजूद चीतों से पैदा हुए।
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कूनो में अधिकांश चीते निगरानी के तहत खुले बाड़ों में रह रहे हैं, जबकि कुछ को अन्य उपयुक्त आवासों में स्थानांतरित किया गया है। हाल ही में 3 चीतों को मध्य प्रदेश के गांधीसागर वन्य क्षेत्र में छोड़ा गया है, ताकि नए आवासों में उनकी अनुकूलन क्षमता का आकलन किया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में जन्मे शावकों की संख्या बढ़ना इस परियोजना के लिए सकारात्मक संकेत है। इससे यह स्पष्ट होता है कि चीते स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हो रहे हैं।
क्वारंटाइन और निगरानी क्यों जरूरी
वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी जंगली प्रजाति को नए देश या पारिस्थितिकी तंत्र में बसाने से पहले स्वास्थ्य जांच और अनुकूलन प्रक्रिया अनिवार्य होती है।
बोत्सवाना से आए इन चीतों को लगभग एक महीने तक अलग बाड़ों में रखा जाएगा। इस दौरान उनका व्यवहार, खानपान, गतिविधि स्तर और संभावित रोगों की जांच की जाएगी। इसके बाद विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर उन्हें बड़े बाड़े में छोड़ा जाएगा।
पशु चिकित्सकों की टीम लगातार उनके स्वास्थ्य की निगरानी करेगी। हर चीते को ट्रैकिंग कॉलर से लैस किया गया है, जिससे उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।
‘प्रोजेक्ट चीता’ की शुरुआत
भारत सरकार ने 2022 में ‘प्रोजेक्ट चीता’ की शुरुआत की थी। इसके तहत अफ्रीकी देशों से चीतों को लाकर भारत के चयनित संरक्षित क्षेत्रों में बसाने की योजना बनाई गई।
इस परियोजना का उद्देश्य केवल एक प्रजाति को वापस लाना नहीं है, बल्कि घास के मैदानों और शुष्क वन पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करना भी है। चीता एक शीर्ष शिकारी प्रजाति है, जो शिकार प्रजातियों की संख्या नियंत्रित रखकर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भूमिका निभाता है।
वन्यजीव वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी पुनर्वास परियोजना की सफलता समय के साथ ही आंकी जा सकती है। इसमें प्राकृतिक मृत्यु, पर्यावरणीय चुनौतियां और अनुकूलन की कठिनाइयां शामिल होती हैं।













