दतिया भाजपा जिलाध्यक्ष के फर्जी निष्कासन पत्र कांड में बड़ा खुलासा, तीन भाजपा कार्यकर्ता गिरफ्तार
Datia News : मध्य प्रदेश के दतिया में विधानसभा उपचुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर वायरल हुए भाजपा जिलाध्यक्ष के कथित निष्कासन पत्र मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। भोपाल क्राइम ब्रांच ने तकनीकी जांच और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर भाजपा से जुड़े तीन लोगों को गिरफ्तार किया है।
पुलिस के अनुसार, प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि फर्जी पत्र को मतदान से पहले कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भ्रम फैलाने के उद्देश्य से प्रसारित किया गया था। आरोपियों को अदालत में पेश करने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। वहीं, जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस पूरे मामले में और कौन-कौन लोग शामिल थे तथा फर्जी दस्तावेज तैयार करने की साजिश किस स्तर पर रची गई।
मतदान से पहले वायरल हुआ था कथित निष्कासन पत्र
जांच अधिकारियों के अनुसार, मतदान से ठीक पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कई व्हाट्सएप ग्रुपों में एक पत्र तेजी से वायरल हुआ। इस पत्र में दावा किया गया था कि भाजपा के दतिया जिलाध्यक्ष रघुवीर कुशवाहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों और अनुशासनहीनता के आरोप में तत्काल प्रभाव से पद से हटाया गया है।
कुछ ही समय में यह पत्र हजारों लोगों तक पहुंच गया, जिससे राजनीतिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बन गई। हालांकि पार्टी पदाधिकारियों ने जल्द ही इसे फर्जी बताते हुए लोगों से अफवाहों पर विश्वास नहीं करने की अपील की थी।
तकनीकी जांच से आरोपियों तक पहुंची क्राइम ब्रांच
भोपाल क्राइम ब्रांच ने साइबर तकनीक, डिजिटल ट्रेल और मोबाइल डेटा की मदद से मामले की जांच शुरू की। जांच के दौरान पुलिस ने तीन आरोपियों की पहचान की और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार किए गए आरोपियों में भाजपा के दतिया जिला मीडिया प्रभारी शादाब, नगर उपाध्यक्ष शाहरूख तथा एक कार्यकर्ता क्रिश रावत शामिल हैं। पूछताछ के दौरान पुलिस को कई डिजिटल साक्ष्य मिले, जिनके आधार पर आगे की जांच जारी है।
फर्जी पत्र में क्या था खास?
जांच में सामने आया कि वायरल किए गए पत्र में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के नाम और हस्ताक्षर का कथित इस्तेमाल किया गया था। लेकिन दस्तावेज में कई ऐसी गंभीर खामियां थीं, जिनसे उसके फर्जी होने का संदेह मजबूत हुआ।
पत्र में कोई आधिकारिक क्रमांक नहीं था। उस पर जारी होने की तिथि भी दर्ज नहीं थी। सामान्य प्रशासनिक प्रारूप का पालन भी नहीं किया गया था। यही कारण रहा कि शुरुआती जांच में ही अधिकारियों को दस्तावेज संदिग्ध लगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी राजनीतिक दल या सरकारी संस्था का आधिकारिक आदेश सामान्यतः निर्धारित प्रारूप, पत्र क्रमांक और तिथि के साथ जारी किया जाता है। इन बुनियादी तथ्यों का अभाव किसी भी दस्तावेज की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
डिजिटल फॉरेंसिक जांच अब भी जारी
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, आरोपियों के मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरणों की फॉरेंसिक जांच कराई जा रही है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि फर्जी दस्तावेज किस डिवाइस पर तैयार किया गया, उसे सबसे पहले किसने साझा किया और उसके बाद किन-किन प्लेटफॉर्म पर उसे वायरल किया गया।
यदि जांच में अन्य लोगों की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
