खुशी से रिश्वत लेने की बात कबूल करने वाले इंजीनियर निलंबित, पन्ना में बड़ा घोटाला
पन्ना में लोकायुक्त की ट्रैप के बाद वायरल बयान ने अधिकारी की नौकरी पर रोक लगा दी
Lokayukta Trap, मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में जल संसाधन विभाग की हाल की घटना ने एक बार फिर सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सागर लोकायुक्त की टीम ने मझगांय मध्यम परियोजना की नहर निर्माण से जुड़े अंतिम बिल पास कराने के नाम पर रिश्वत लेते दो कर्मचारियों को रंगे हाथ पकड़ा। इसके बाद विभाग के कार्यपालन यंत्री सीबी अहिरवार का मीडिया से बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैला। वीडियो में अधिकारी स्पष्ट रूप से कहते दिखे कि वे किसी से दबाव बनाकर या तय प्रतिशत लेकर रिश्वत नहीं लेते। लेकिन अगर कोई ठेकेदार अपनी खुशी से कुछ दे दे तो वे मना नहीं करते। उन्होंने इसे ठेकेदार की सद्भावना भी बताया।
यह बयान सामान्य नहीं था। सरकारी सेवा के नियमों में लोक सेवक द्वारा किसी भी अनुचित लाभ को स्वीकार करना गंभीर मसला माना जाता है। मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के तहत शासकीय कर्मचारी को पूरी निष्ठा से काम करना होता है और अशोभनीय आचरण से बचना जरूरी है। शासन ने 30 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश में स्पष्ट लिखा कि अधिकारी के 28 अक्टूबर वाले वक्तव्य में कदाचरण की स्वीकारोक्ति साफ दिखती है। आदेश क्रमांक एफ 6/2/0006/2026/पी-2/31 के तहत उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर प्रमुख अभियंता जल संसाधन विभाग भोपाल के मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया।
मामले की शुरुआत ठेकेदार गौरव तोमर की शिकायत से हुई। ग्वालियर निवासी इस ठेकेदार ने अजयगढ़ क्षेत्र में स्थित मझगांय बांध की नहर निर्माण का काम किया था। अंतिम बिल भुगतान के समय विभाग के संभागीय लेखापाल दीपक परिहार और लिपिक अरविंद पाठक से रिश्वत मांगी गई। लोकायुक्त टीम ने कार्रवाई में दीपक परिहार के पास से 15 हजार और अरविंद पाठक के पास से 30 हजार रुपये बरामद किए। कुल 45 हजार रुपये की रिश्वत का मामला सामने आया। इस घटना के बाद जब कार्यपालन यंत्री से पूछताछ हुई तो उनका जवाब चर्चा का केंद्र बन गया।

अधिकारी ने कहा कि उनका या उनके अधीनस्थ इंजीनियरों का कोई फिक्स कमीशन या परसेंटेज नहीं है। मांगना अपराध है, लेकिन स्वेच्छा से दी गई राशि को वे स्वीकार कर लेते हैं। कई लोगों ने इसे ईमानदारी का दावा बताया तो कई ने इसे भ्रष्टाचार को सामान्य बनाने का तरीका करार दिया। सोशल मीडिया पर वीडियो फैलते ही विभाग में हलचल मच गई। उच्च अधिकारियों तक बात पहुंची और शासन ने त्वरित कार्रवाई की। निलंबन आदेश में मध्यप्रदेश सिविल सेवा वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील नियम 1966 के नियम 9(1)(क) का भी उल्लेख है।
यह घटना अकेली नहीं है। जल संसाधन और निर्माण से जुड़े विभागों में बिल पास कराने के नाम पर कमीशन की शिकायतें समय-समय पर आती रहती हैं। लोकायुक्त जैसी एजेंसियां ट्रैप लगाकर पकड़ती हैं, लेकिन कई बार सिस्टम की जड़ें गहरी होती हैं। इस मामले में अधिकारी खुद कैमरे के सामने बोल गए। उन्होंने शिकायतकर्ता ठेकेदार का जिक्र करते हुए यह भी कहा कि ठेकेदार ने उनसे कर्मचारियों की शिकायत नहीं की थी। फिर भी उनका बयान नियमों के खिलाफ माना गया।
निलंबन के बाद अधिकारी भोपाल मुख्यालय से जुड़े रहेंगे। आगे की जांच और विभागीय कार्रवाई का रास्ता खुला है। आरोप साबित होने पर सजा का प्रावधान है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अनुचित लाभ स्वीकार करना भी अपराध की श्रेणी में आ सकता है। आम नागरिकों के लिए यह घटना याद दिलाती है कि सरकारी कामों में पारदर्शिता कितनी जरूरी है। ठेकेदारों और कर्मचारियों के बीच लेन-देन की संस्कृति अगर बनी रही तो विकास योजनाएं प्रभावित होती रहेंगी।
