एमपी हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज की मिसाल: शरीर और जीवन भर की जमा पूंजी दोनों समाज के नाम
Mp Big News,Madhya Pradesh News : हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह ने अपने रिटायरमेंट के मौके पर ऐसा फैसला सुनाया, जिसकी चर्चा अब अदालत परिसर से बाहर भी हो रही है। उन्होंने और उनकी पत्नी ने मृत्यु के बाद अपना शरीर दान करने का संकल्प लिया है। इसके लिए दोनों ने देहदान का पंजीकरण भी करा लिया है। उनका शरीर मेडिकल छात्रों की पढ़ाई और अध्ययन के काम आएगा।
बात यहीं खत्म नहीं हुई। जस्टिस सिंह ने अपने जनरल प्रोविडेंट फंड (GPF) से मिलने वाली 1 करोड़ 1 लाख रुपये की राशि 'पीएम केयर फंड' में देने की घोषणा भी की। 36 साल तक न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले एक जज के लिए यह रिटायरमेंट का आखिरी दिन था। लेकिन उन्होंने इसे समाज के लिए एक नई शुरुआत बना दिया।
जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह कौन हैं?
अवनींद्र कुमार सिंह ने 1990 में सिविल जज के तौर पर न्यायिक सेवा शुरू की थी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों में उनके न्यायिक सेवा के दौरान अलग-अलग पदों पर रहने का उल्लेख मिलता है। वर्ष 2023 में उन्होंने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली और सितंबर 2026 में सेवानिवृत्त हुए।
उनकी पहचान 36 साल की न्यायिक सेवा के बाद अब उनके रिटायरमेंट पर लिए गए इन दो संकल्पों से भी जुड़ गई है पत्नी के साथ देहदान का पंजीयन और GPF की 1.01 करोड़ रुपये की राशि PM CARES Fund में देने की घोषणा।
36 साल का सफर और आभार
विदाई समारोह में जस्टिस सिंह ने अपनी 36 वर्षों की न्यायिक यात्रा का अनुभव साझा किया। उन्होंने इस लंबे सफर में साथ देने वालों के प्रति आभार व्यक्त किया। इतने लंबे कार्यकाल के बाद कोई व्यक्ति आराम की बात सोचता है। जस्टिस सिंह ने इसके उलट, अपनी सेवानिवृत्ति को दूसरों के काम आने का अवसर बना लिया।
देहदान क्या है और यह क्यों मायने रखता है
देहदान का मतलब है कि कोई व्यक्ति जीवित रहते हुए यह संकल्प ले कि मृत्यु के बाद उसका शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए दिया जाए। मेडिकल कॉलेजों में छात्र मानव शरीर की बनावट को समझने के लिए दान किए गए शरीरों पर अध्ययन करते हैं। किताबें और मॉडल मदद करते हैं, लेकिन असली शरीर से सीखने का अनुभव अलग होता है।
आम तौर पर इसके लिए पहले से पंजीकरण कराया जाता है। परिवार की सहमति और जानकारी भी जरूरी होती है, ताकि समय आने पर प्रक्रिया आसानी से पूरी हो सके। प्रक्रिया और नियम अलग-अलग मेडिकल संस्थानों में थोड़े भिन्न हो सकते हैं, इसलिए इच्छुक लोगों को अपने नजदीकी मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग से जानकारी लेनी चाहिए।
जस्टिस सिंह और उनकी पत्नी का पंजीकरण इसलिए भी अहम है कि एक प्रतिष्ठित संवैधानिक पद से जुड़े व्यक्ति के फैसले का असर आम लोगों की सोच पर पड़ता है। कई परिवारों में देहदान को लेकर हिचक रहती है। ऐसे उदाहरण उस हिचक को कम कर सकते हैं।
1.01 करोड़ का दान
GPF वह जमा पूंजी है, जो कर्मचारी अपने सेवाकाल में धीरे-धीरे जोड़ते हैं। रिटायरमेंट के समय यही राशि भविष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा मानी जाती है। जस्टिस सिंह ने इस राशि को, यानी 1 करोड़ 1 लाख रुपये को, पीएम केयर फंड में देने का फैसला किया।
