मध्य प्रदेश फोर्टिफाइड चावल घोटाला: 17 ट्रक जब्त, 50 से ज्यादा संदिग्धों से पूछताछ, जांच तेज
मध्य प्रदेश में इन दिनों एक बड़ा ही अजीब और गंभीर मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। बात है हमारे और आपके जैसे आम लोगों के हक के चावल की। सरकारी गोदामों से जो चावल गरीबों की थाली और पोषण के लिए निकलता है, वह एथेनॉल प्लांट तक पहुँचने के बजाय बीच रास्ते से ही गायब हो रहा था। यह कोई छोटी-मोटी चोरी नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये का वह फोर्टिफाइड चावल घोटाला है जिसने पूरे सिस्टम को हिलाकर रख दिया है। अब इस पूरे मामले की जांच एक ऐसे मोड़ पर आ गई है जहाँ से बड़े-बड़े सफेदपोशों के चेहरों से नकाब उतरना तय माना जा रहा है। जांच एजेंसियों ने अभी तक इस मामले में 17 ट्रकों को जब्त किया है। यह अपने आप में इस बात का सबूत है कि खेल कितना बड़ा था। पुलिस और जांच टीमें पिछले कुछ दिनों से 50 से ज्यादा लोगों से सख्ती से पूछताछ कर चुकी हैं। अब तक 13 से ज्यादा लोगों के नाम एफआईआर में दर्ज किए जा चुके हैं और यह आंकड़ा अभी और बढ़ सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस सिंडिकेट के तार ऐसे रसूखदार लोगों से जुड़े बताए जा रहे हैं, जिनके पास अब जवाब देते नहीं बन रहा है। एजेंसियों की नजरें अब उन संदिग्धों के बैंक खातों और लेनदेन पर टिकी हैं, जिससे पता चल सके कि काली कमाई का यह पैसा कहां-कहां ठिकाने लगाया गया। इस पूरे गोरखधंधे का गणित समझेंगे तो माथा ठनक जाएगा। सिस्टम का खेल देखिए कि जिस फोर्टिफाइड चावल की कीमत सरकारी कागजों में 2320 रुपये प्रति क्विंटल थी, उसे एथेनॉल के नाम पर आवंटित कराया जाता था। लेकिन उसे प्लांट भेजने की जहमत कौन उठाए? सिंडिकेट के लोग उसे सीधे ओपन मार्केट या निजी राइस मिलों में 2800 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से खपा देते थे। बीच में जो 400-500 रुपये का मुनाफा प्रति क्विंटल होता था, उसे बिचौलियों, ट्रांसपोर्टर्स और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के बीच बराबर बांटा जाता था। यह सीधी-सीधी गरीबों के निवाले पर डाका डालने वाली बात थी। इस बड़े खुलासे की शुरुआत 3 जून को वारासिवनी से हुई। वहां संचेती राइस मिल के पास एक ट्रक संदिग्ध हालत में पकड़ा गया। जब गाड़ी के कागजात देखे गए तो पता चला कि यह चावल तो बालाघाट के एफसीआई गोदाम से छिंदवाड़ा की 'एवीजे एग्रिको प्राइवेट लिमिटेड' के एथेनॉल प्लांट के लिए निकला था। अब सवाल यह था कि एथेनॉल प्लांट जाने वाली गाड़ी राइस मिल में क्या कर रही थी? यहीं से इस पूरे नेटवर्क की कलई खुल गई। यह तो बस एक ट्रक था, जिसके जरिए पूरे सिंडिकेट का कच्चा-चिट्ठा सामने आ गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने साफ कर दिया है कि किसी को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कलेक्टर की जांच में यह बात सामने आई है कि 242.55 क्विंटल चावल का सीधे तौर पर डायवर्जन किया गया। मंत्री जी ने बताया कि एवीजे एग्रिको के प्रतिनिधि और राइस मिल संचालक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। उन्होंने यह भी कहा है कि इस व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए केंद्र सरकार को भी पत्र लिखा गया है ताकि भविष्य में ऐसी धांधली न हो सके। वहीं दूसरी ओर, फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया यानी एफसीआई ने अपना हाथ झाड़ लिया है। उनका कहना है कि आवंटन के समय नियम कायदों का पूरा पालन किया गया था। एफसीआई के अधिकारी तर्क दे रहे हैं कि उनके स्तर पर कोई गलती नहीं हुई। अब सच्चाई जो भी हो, लेकिन जनता यह जरूर जानना चाहती है कि अगर एफसीआई ने सही चावल भेजा था, तो वह रास्ता कैसे भटक गया? फिलहाल राज्य की जांच एजेंसियां इसी पहेली को सुलझाने में जुटी हैं कि आखिर वह कौन सा रसूखदार हाथ था, जिसने चावल के ट्रकों का रुख एथेनॉल प्लांट के बजाय निजी मिलों की ओर मोड़ दिया था।
