मध्य प्रदेश का जलवा: एक साथ 12 फसलों को GI टैग, किसानों की बल्ले-बल्ले
Mp GI Tag : मध्य प्रदेश ने कृषि के क्षेत्र में एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी राज्य को एक साथ 12 अलग-अलग उद्यानिकी फसलों के लिए जीआई टैग (GI Tag) मिला हो। यह सिर्फ एक सरकारी प्रमाणपत्र नहीं है, बल्कि उन फसलों की विशिष्टता और स्वाद पर दुनिया भर की मुहर है। अब मध्य प्रदेश की इन खास फसलों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक नई पहचान मिलेगी, जिसका सीधा फायदा राज्य के मेहनती किसानों को होगा। जीआई टैग का मतलब होता है 'जियोग्राफिकल इंडिकेशन'। आसान भाषा में समझें तो यह एक भौगोलिक पहचान है। जैसे बीकानेरी भुजिया या दार्जिलिंग चाय को एक खास जगह के नाम से पहचाना जाता है, ठीक वैसे ही अब मध्य प्रदेश की ये फसलें भी अपनी मिट्टी और जलवायु के कारण दुनिया में जानी जाएंगी। यह उपलब्धि इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यह 'कृषक कल्याण वर्ष' में मिली है, जो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के उस विजन को मजबूती देती है जिसमें वे किसानों की आय को दोगुना करने का सपना देख रहे हैं। फिलहाल राज्य में करीब 28 लाख हेक्टेयर में उद्यानिकी खेती हो रही है, जिसे सरकार 2030 तक 30 लाख हेक्टेयर तक ले जाने की पूरी तैयारी कर चुकी है। गुना का कुम्भराज धनिया, जो पिछले 60 वर्षों से अपनी महक बिखेर रहा है, अब पूरी दुनिया में अपनी जगह बनाएगा। इसकी खासियत यह है कि यह केवल 85-90 दिन में पककर तैयार हो जाता है। वहीं दूसरी ओर नरसिंहपुर का बरमान भटा यानी बैंगन अपनी अलग मिठास के लिए मशहूर है। नर्मदा किनारे की बालुई मिट्टी में पैदा होने वाले इस बैंगन को खाने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। अब इस जीआई टैग से इसके दाम और मांग दोनों में बढ़ोतरी तय है। खरगोन की लाल मिर्च का तो डंका पहले ही बजता रहा है। निमाड़ और मालवा की यह तीखी मिर्च चीन, पाकिस्तान, मलेशिया और सऊदी अरब तक निर्यात की जाती है। अब इसे जीआई टैग मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी ब्रांडिंग और बेहतर होगी। इसी तरह, मांडू की खुरासानी इमली, जिसे बाओबाब भी कहा जाता है, का इतिहास 14वीं शताब्दी से जुड़ा है। अब यह ऐतिहासिक धरोहर अपनी विशिष्ट पहचान के साथ वैश्विक मंच पर होगी। जबलपुर के मटर और वहां के सिंघाड़े को मिली मान्यता भी स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। जबलपुर का मटर अपनी गुणवत्ता के कारण पहले से ही पसंदीदा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, आलीराजपुर का नूरजहां आम दुनिया के सबसे खास आमों में से एक है। इसका वजन 3 से 3.5 किलोग्राम तक हो सकता है और यह लंबाई में एक फुट तक पहुंच जाता है। जब इतना बड़ा और रसीला आम किसी के सामने आएगा, तो लोग खुद-ब-खुद पूछेंगे कि यह कहां का है। बैतूल का गजरिया आम और मालवा का गराडू भी इस सूची में शामिल हैं। मालवी आलू अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता के कारण पहले से ही खास है। सिवनी का सीताफल, जिसका वजन 600 से 700 ग्राम तक होता है, अब दुनिया के बाजारों में अपनी मिठास घोलेगा। और नरसिंहपुर का गुड़, जिसे मध्य प्रदेश का 'चीनी का कटोरा' कहा जाता है, अब आधिकारिक तौर पर अपनी गुणवत्ता का लोहा मनवाएगा। सरकार का लक्ष्य यहीं नहीं रुक रहा है। उज्जैन की इमली, आलीराजपुर का अचारी आम, मालवा का सफेद प्याज, झाबुआ का दाल पानिया और मंदसौर के देशी जीरे जैसे कई अन्य उत्पादों के लिए भी प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं। आने वाले समय में मध्य प्रदेश की कृषि का यह स्वर्णिम अध्याय और भी लंबा होने वाला है। किसानों के लिए यह न केवल गर्व की बात है, बल्कि उनके भविष्य को सुरक्षित करने और उनकी मेहनत का सही दाम पाने का एक बड़ा अवसर भी है।
