मूंग ने बिगाड़ा सरकार का बजट ,किसानों की मौज या सरकारी खजाने पर भारी चोट?
madhya pradesh moong price : मध्यप्रदेश में गर्मी की मूंग अब सरकार के लिए मुसीबत बन गई है। हर साल यही कहानी दोहराई जाती है। किसान खेत में मूंग उगाते हैं, सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदती है, और फिर वही मूंग बेचते वक्त सरकार का खजाना खाली हो जाता है।
आंकड़े देखें तो हैरानी होगी। वर्ष 2023-24 और 2024-25 की मूंग बेचकर सरकार को करीब 2 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। और अब पिछले साल खरीदी गई मूंग पर 1200 करोड़ रुपए का घाटा होना भी लगभग तय माना जा रहा है।
आखिर घाटा हो क्यों रहा है
बात सीधी सी है। केंद्र सरकार हर साल राज्यों के लिए मूंग खरीदी का एक कोटा तय करती है। लेकिन मध्यप्रदेश में मूंग की पैदावार इतनी ज्यादा है कि यह कोटा हमेशा कम पड़ जाता है।
पिछले तीन साल से मप्र सरकार तय कोटे से ज्यादा मूंग खरीद रही है। दिक्कत यह है कि जो हिस्सा कोटे से ऊपर खरीदा जाता है, उसे केंद्र सरकार नहीं लेती। यह अतिरिक्त मूंग राज्य को खुले बाजार में टेंडर निकालकर बेचनी पड़ती है।
अब यहीं से नुकसान शुरू होता है। व्यापारी टेंडर में वह दाम नहीं देते, जो सरकार ने किसानों से समर्थन मूल्य पर चुकाया था। नतीजा, सरकार को घाटा उठाना पड़ता है।
आंकड़ों की जुबानी पूरी कहानी
वित्तीय वर्ष 2023-24 में मप्र ने किसानों से कुल 5.60 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी। इसमें से 2.84 लाख मीट्रिक टन केंद्र के तय कोटे से ज्यादा थी।
अगले साल यानी 2024-25 में स्थिति और बिगड़ी। इस बार 5.80 लाख मीट्रिक टन खरीदी हुई, जो कोटे से 2.49 लाख मीट्रिक टन ज्यादा थी। दोनों साल मिलाकर करीब 5.33 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त मूंग किसानों से खरीदी गई।
यह खरीदी 8682 से 8768 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर हुई थी, जो केंद्र का तय समर्थन मूल्य था। लेकिन जब यही मूंग बेचने के लिए टेंडर निकाले गए, तो प्रति क्विंटल 1500 से 2000 रुपए तक कम दाम मिले।
हमारी सरकार किसानों के साथ सदैव खड़ी है, हम सकारात्मक सुझावों के साथ समस्या का समाधान संवाद से निकालते हैं, जनता को कष्ट न हो इसकी चिंता दोनों पक्षों को करना चाहिए।
— Dr Mohan Yadav (@DrMohanYadav51) July 29, 2026
हमारी सरकार ने कमेटी गठित की है, जो किसान भाइयों से सतत संवाद कर रही है। pic.twitter.com/5k2QDQEsZJ
मार्कफेड से जुड़े एक अधिकारी बताते हैं कि घाटे को देखते हुए कई बार टेंडर रद्द भी किए गए, लेकिन दोबारा कोशिश करने पर भी खरीदी दाम के बराबर बोली नहीं मिली। आखिरकार 2 हजार करोड़ का घाटा सहकर ही मूंग बेचनी पड़ी।
एक दिन में ही भाव 500 रुपए उछल गए
अब बात करते हैं मंडियों की। जैसे ही सरकार ने खरीदी की सीमा बढ़ाने का ऐलान किया, मंडियों में मूंग की आवक अचानक घट गई। लेकिन भाव में जोरदार उछाल आ गया।
अनाज कारोबारी संजीव जैन के मुताबिक गुरुवार को प्रदेश की मंडियों में करीब 20 हजार क्विंटल मूंग बिकने आई, जबकि एक दिन पहले यह आंकड़ा 25 हजार क्विंटल के आसपास था। इस दौरान मूंग का अधिकतम भाव 7605 रुपए और औसत भाव 6900 रुपए प्रति क्विंटल दर्ज हुआ।
भाव बढ़ने के बावजूद किसान खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि क्वालिटी के हिसाब से अब भी 1500 से 3000 रुपए प्रति क्विंटल तक का नुकसान झेलना पड़ रहा है।
आंदोलन का असर, खरीदी सीमा बढ़ी
भोपाल में किसानों के आंदोलन के बाद सरकार को झुकना पड़ा। खरीदी की सीमा 25 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी कर दी गई। पहले प्रति एकड़ 120 किलो यानी करीब सवा क्विंटल खरीदी का नियम था, जिसे बढ़ाकर 300 किलो यानी 3 क्विंटल कर दिया गया। इस फैसले के बाद गुरुवार को मंडियों में मूंग की आवक एकदम से घट गई, क्योंकि किसानों को अब सरकारी खरीदी पर ज्यादा भरोसा हो गया।
समाधान क्या हो सकता है
एक पहलू यह भी है कि मूंग की खेती में कीटनाशकों का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। अगर इससे दानों में जहरीलापन आ रहा है, तो केंद्र और राज्य को इसकी जांच करानी चाहिए। जांच में सच सामने आए तो उस पैदावार पर रोक लगे।
किसान हित सर्वोपरि
— Jansampark MP (@JansamparkMP) July 30, 2026
मूंग उत्पादक किसानों को बड़ी राहत
✅ ग्रीष्मकालीन मूंग उपार्जन 60% तक बढ़ाया गया
✅स्लॉट बुकिंग की अंतिम तिथि 10 अगस्त
✅उपार्जन की अंतिम तिथि 20 अगस्त तक बढ़ी@DrMohanYadav51 @CMMadhyaPradesh @AgriGoI @minmpkrishi #JansamparkMP #कृषक_कल्याण_वर्ष_2026 pic.twitter.com/CJfWoyB4HG
और अगर मूंग जहरीली नहीं है, तो फिर उन कीटनाशकों की बिक्री पर रोक लगनी चाहिए जो बेवजह इस्तेमाल हो रहे हैं। साथ ही, राज्य में जितनी भी मूंग पैदा होती है, केंद्र को उसका एक-एक दाना खरीदना चाहिए। तभी यह विवाद हमेशा के लिए खत्म हो सकता है।
आगे और झटका लगना तय
वित्तीय वर्ष 2025-26 की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं है। इस साल मप्र ने कुल 7.72 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी, जबकि केंद्र का तय लक्ष्य केवल 4.19 लाख मीट्रिक टन था। यानी 3.53 लाख मीट्रिक टन मूंग कोटे से ज्यादा खरीदी गई।
वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक इस अतिरिक्त मूंग को बेचने के लिए अब तक तीन बार टेंडर निकाले जा चुके हैं, लेकिन बात नहीं बनी। व्यापारी कम दाम लगा रहे हैं और मूंग को ज्यादा दिन गोदाम में रखने पर खराब होने का खतरा अलग से बना हुआ है। अगर आगे भी अच्छे दाम नहीं मिले, तो 1200 से 1500 करोड़ रुपए का नुकसान होना तय माना जा रहा है।
अफसरों की सुनिए, कहां जाएं हम
यह पूरा मामला अब एक ऐसी उलझन बन गया है, जिसका कोई आसान हल नज़र नहीं आता। केंद्र का कोटा सीमित है, लेकिन मध्यप्रदेश में मूंग की पैदावार उससे कहीं ज्यादा हो रही है।
ज्यादा खरीदने पर सरकार का खजाना खाली होता है, और नहीं खरीदने पर किसान सड़कों पर उतर आते हैं। मार्कफेड से जुड़े अधिकारी बेबाकी से कहते हैं कि किसान तो आंदोलन करके अपनी बात मनवा लेते हैं, लेकिन नुकसान का हिसाब देने की बारी जब आती है, तो अधिकारियों के पास कोई जवाब नहीं बचता।
