MP Agriculture News Today : देश में दाल की बढ़ती मांग और किसानों की लागत को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार एक अहम कदम उठाने की तैयारी में है। इंदौर में आयोजित एक राष्ट्रीय स्तर के कृषि और अनाज व्यापार कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने संकेत दिए कि मसूर और उड़द जैसी दालों का उत्पादन बढ़ाने वाले किसानों को आने वाले समय में सरकार की ओर से बोनस दिया जा सकता है। यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब दालों की कीमत, उत्पादन और किसानों की आय तीनों बड़े मुद्दे बने हुए हैं। मुख्यमंत्री इंदौर में आयोजित तीन दिवसीय GrainEx India कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर शामिल हुए थे। यह कार्यक्रम ऑल इंडिया दाल मिल एसोसिएशन की ओर से आयोजित किया गया है, जिसमें देशभर से दाल व्यापारी, प्रोसेसर, निर्यातक और किसान प्रतिनिधि शामिल हुए। इसी मंच से सरकार की नई सोच और नीति की झलक देखने को मिली।
दाल उत्पादन क्यों है सरकार की प्राथमिकता
भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। देश की बड़ी आबादी शाकाहारी है और दाल उनके लिए प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। बावजूद इसके, कई बार देश को दालों के लिए आयात पर निर्भर होना पड़ता है। इसकी बड़ी वजह कुछ खास दालों का सीमित उत्पादन और किसानों के लिए कम मुनाफा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने संबोधन में साफ कहा कि मध्य प्रदेश अब सिर्फ अनाज उत्पादन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह देश का फूड बास्केट बन चुका है। गेहूं, चावल, सोयाबीन के साथ-साथ दालों में भी राज्य की भूमिका लगातार बढ़ रही है। सरकार चाहती है कि मसूर और उड़द जैसी दालों में मध्य प्रदेश आत्मनिर्भर बने और किसानों को इसका सीधा फायदा मिले।
बोनस योजना से किसानों को क्या फायदा होगा
सरकार जिस बोनस योजना पर विचार कर रही है, उसका मकसद किसानों को दाल उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना है। आमतौर पर किसान वही फसल उगाते हैं, जिसमें उन्हें सुनिश्चित बाजार और बेहतर दाम मिलते हैं। मसूर और उड़द में जोखिम ज्यादा और मुनाफा सीमित माना जाता है। अगर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के ऊपर बोनस देती है, तो किसानों की आय बढ़ेगी और वे इन दालों की खेती की ओर ज्यादा आकर्षित होंगे। इससे उत्पादन बढ़ेगा, बाजार में आपूर्ति सुधरेगी और उपभोक्ताओं को भी स्थिर कीमतों पर दाल मिल सकेगी।
व्यापारियों और मिल मालिकों की समस्याएं भी आईं सामने
GrainEx India कार्यक्रम सिर्फ घोषणाओं तक सीमित नहीं रहा। दाल व्यापार से जुड़े लोगों ने इस मौके पर अपनी व्यावहारिक समस्याएं भी सरकार के सामने रखीं। व्यापारियों का कहना है कि मंडी टैक्स और अन्य शुल्क उनकी लागत बढ़ा रहे हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है। इसके अलावा, शहर के बीच स्थित अनाज मंडियों को लेकर भी चिंता जताई गई। व्यापारियों ने मांग की कि भीड़, ट्रैफिक और लॉजिस्टिक समस्याओं को देखते हुए अनाज मंडियों को शहर के बाहर शिफ्ट करने पर गंभीरता से विचार किया जाए।
टैक्स राहत पर भी सरकार के संकेत
मुख्यमंत्री ने व्यापारियों की बातों को गंभीरता से सुनते हुए कहा कि सरकार संतुलन बनाकर फैसले लेना चाहती है। उन्होंने याद दिलाया कि पहले तुअर दाल पर टैक्स को लेकर राहत दी जा चुकी है और अब मसूर दाल के मामले में भी सरकार सकारात्मक रुख अपनाने पर विचार कर रही है। उनका कहना था कि किसानों, व्यापारियों और उपभोक्ताओं तीनों के हित को साथ लेकर चलना सरकार की जिम्मेदारी है। टैक्स में राहत से जहां व्यापार को बढ़ावा मिलेगा, वहीं इसका असर कीमतों पर भी पड़ेगा।
दुग्ध उत्पादन का भी जिक्र, ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर फोकस
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने केवल दाल उत्पादन तक बात सीमित नहीं रखी। उन्होंने दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की योजनाओं का भी जिक्र किया। सरकार का मानना है कि खेती के साथ पशुपालन को जोड़कर ग्रामीण आय को स्थिर और मजबूत बनाया जा सकता है। दाल और दूध दोनों ही ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका सीधा संबंध ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण और रोजगार से जुड़ा है। इसी वजह से सरकार इन सेक्टरों में निवेश और प्रोत्साहन की नीति अपना रही है।
किसानों के लिए क्या बदल सकता है आने वाले समय में
अगर मसूर और उड़द पर बोनस योजना लागू होती है, तो इसका असर सिर्फ एक सीजन तक सीमित नहीं रहेगा। इससे फसल चक्र बदलेगा, मिट्टी की सेहत सुधरेगी और किसानों को नई फसलों का अनुभव मिलेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि दालों की खेती मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती है, जिससे अगली फसलों की पैदावार भी बेहतर होती है। इस लिहाज से यह फैसला खेती के दीर्घकालीन फायदे भी लेकर आ सकता है।