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नई आबकारी नीति और सोयाबीन खरीदी पर मोहन यादव सरकार का बड़ा मंथन


MP Cabinet Meeting Decisions : मध्य प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में आज का दिन काफी अहम माना जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अगुवाई में राजधानी भोपाल स्थित मंत्रालय में हुई कैबिनेट बैठक में ऐसे फैसलों पर चर्चा हुई, जिनका असर सीधे राज्य की अर्थव्यवस्था, लाखों किसानों की आमदनी और सरकारी कर्मचारियों की जेब पर पड़ सकता है। सुबह 11 बजे शुरू हुई इस बैठक को लेकर पहले से ही कई वर्गों में उम्मीदें थीं, क्योंकि एजेंडे में राजस्व बढ़ाने से लेकर कृषि और कर्मचारी हितों से जुड़े मुद्दे शामिल थे। राज्य सरकार इस समय एक संतुलन बनाने की कोशिश में है। एक ओर खजाने की स्थिति मजबूत करना जरूरी है, तो दूसरी ओर किसान और कर्मचारी जैसे बड़े सामाजिक समूहों की अपेक्षाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि आज की बैठक को केवल एक नियमित कैबिनेट मीटिंग नहीं, बल्कि आने वाले महीनों की दिशा तय करने वाला मंच माना जा रहा है।

नई आबकारी नीति से सरकार की कमाई बढ़ाने की तैयारी

बैठक में जिन प्रस्तावों पर सबसे ज्यादा ध्यान गया, उनमें राज्य की नई आबकारी नीति प्रमुख रही। सरकार इस नीति के जरिए राजस्व संग्रह को नए स्तर पर ले जाना चाहती है। जानकारी के मुताबिक, नई नीति के तहत लगभग 19 हजार करोड़ रुपये की आय का लक्ष्य रखा गया है, जो पिछले वर्षों की तुलना में काफी बड़ा आंकड़ा है। आबकारी नीति राज्य के लिए हमेशा से एक अहम आय स्रोत रही है। शराब बिक्री और उससे जुड़े लाइसेंस के माध्यम से मिलने वाला राजस्व सरकार की कई योजनाओं को चलाने में मदद करता है। इस बार सरकार का जोर सिर्फ कमाई बढ़ाने पर नहीं, बल्कि व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी और नियंत्रित बनाने पर भी है। माना जा रहा है कि नई नीति में लाइसेंस प्रक्रिया, निगरानी व्यवस्था और राजस्व संग्रह के तरीकों में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं, ताकि अवैध गतिविधियों पर लगाम लगे और सरकारी खजाने को पूरा लाभ मिल सके। अगर कैबिनेट इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो यह राज्य की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जाएगा। इसके साथ ही सरकार को सामाजिक योजनाओं और बुनियादी ढांचे पर खर्च करने के लिए अतिरिक्त संसाधन भी मिल सकते हैं।

किसानों के लिए सोयाबीन खरीदी पर बड़ा फैसला संभव

मध्य प्रदेश को देश के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। यहां के लाखों किसान इस फसल पर निर्भर हैं। ऐसे में कैबिनेट बैठक में सोयाबीन की सरकारी खरीदी से जुड़ा प्रस्ताव किसानों के लिए राहत लेकर आ सकता है। केंद्र सरकार की ओर से मध्य प्रदेश को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 13.16 लाख टन सोयाबीन खरीदने का लक्ष्य दिया गया है। राज्य सरकार इस लक्ष्य के करीब, यानी लगभग 13 लाख मीट्रिक टन सोयाबीन खरीदने की तैयारी में है। इसके लिए केंद्र से करीब 7 हजार करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता मिलने की संभावना है। सरकार जानती है कि खरीदी के बाद सबसे बड़ी चिंता किसानों को समय पर भुगतान की होती है। इसी वजह से प्रस्ताव में यह भी शामिल है कि मार्कफेड के जरिए करीब 1100 करोड़ रुपये का ऋण लिया जाएगा, ताकि किसानों को उनकी उपज का पैसा बिना देरी के दिया जा सके। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पहले ही सार्वजनिक रूप से यह भरोसा दिला चुके हैं कि फसल बेचने के तीन दिन के भीतर किसानों के खातों में भुगतान पहुंच जाएगा। सूत्रों के अनुसार, अगर कैबिनेट से मंजूरी मिलती है तो 25 अक्टूबर से सोयाबीन की खरीदी शुरू हो सकती है। इससे बाजार में दाम गिरने की स्थिति में भी किसानों को सुरक्षा मिलेगी और उनकी मेहनत का उचित मूल्य सुनिश्चित हो सकेगा।

सरकारी कर्मचारियों की नजर महंगाई भत्ते पर

इस कैबिनेट बैठक से प्रदेश के लाखों सरकारी कर्मचारियों को भी बड़ी उम्मीदें हैं। लंबे समय से कर्मचारी संगठन मांग कर रहे हैं कि राज्य कर्मचारियों का महंगाई भत्ता केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर किया जाए। फिलहाल, राज्य कर्मचारियों को केंद्र के मुकाबले लगभग 4 प्रतिशत कम डीए मिल रहा है। मार्च महीने में राज्य सरकार ने महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी जरूर की थी, लेकिन इसके बाद भी यह अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। बढ़ती महंगाई के बीच यह अंतर कर्मचारियों की मासिक आय पर असर डालता है। यही कारण है कि आज की बैठक में डीए बढ़ोतरी को लेकर फैसला होने की अटकलें तेज हैं। अगर सरकार इस अंतर को कम करने या खत्म करने का निर्णय लेती है, तो इससे कर्मचारियों की क्रय शक्ति बढ़ेगी और सरकारी सेवा में संतोष का माहौल बनेगा। साथ ही, इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा, क्योंकि बढ़ी हुई आय का एक बड़ा हिस्सा बाजार में खर्च के रूप में लौटता है।

सरकार के सामने संतुलन की चुनौती

आज की कैबिनेट बैठक साफ तौर पर यह दिखाती है कि सरकार के सामने कई मोर्चों पर एक साथ फैसले लेने की चुनौती है। राजस्व बढ़ाना जरूरी है, ताकि विकास योजनाओं को गति मिल सके। किसानों को समर्थन देना जरूरी है, क्योंकि कृषि राज्य की रीढ़ है। वहीं कर्मचारियों की मांगों को नजरअंदाज करना भी सरकार के लिए आसान नहीं है। इन सभी प्रस्तावों पर लिए गए फैसले आने वाले समय में राज्य की राजनीति, प्रशासन और आर्थिक हालात को प्रभावित करेंगे। अब सभी की नजरें कैबिनेट के अंतिम निर्णयों पर टिकी हैं, जिनसे यह साफ होगा कि सरकार किन प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ने जा रही है।