Mp Compassionate appointment Rules 2026 : मध्य प्रदेश
सरकार अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलावों पर विचार कर रही है। यदि प्रस्तावित संशोधन लागू होते हैं, तो सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद नौकरी पाने वाले आश्रितों के लिए केवल नियुक्ति प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करना होगा। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य परिवार को आर्थिक और सामाजिक सहारा देना व्यवहार में भी पूरा हो। यह प्रस्ताव सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा तैयार किए जा रहे नए मसौदे का हिस्सा बताया जा रहा है।
क्या है अनुकंपा नियुक्ति और क्यों हो रही है समीक्षा?
अनुकंपा नियुक्ति वह व्यवस्था है जिसके तहत किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु होने पर उसके आश्रित परिवार के सदस्य को नौकरी दी जाती है, ताकि परिवार अचानक उत्पन्न हुए आर्थिक संकट से उबर सके। हाल के वर्षों में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े कई मामलों ने यह सवाल खड़ा किया कि नौकरी मिलने के बाद कुछ लाभार्थी परिवार से अलग हो जाते हैं या माता-पिता की जिम्मेदारी उठाने से इनकार कर देते हैं। इसी पृष्ठभूमि में सरकार नियमों को अधिक जवाबदेह और परिवार-केंद्रित बनाने की दिशा में काम कर रही है। कानूनी विशेषज्ञ भी लंबे समय से यह स्पष्ट करते रहे हैं कि अनुकंपा नियुक्ति कोई उत्तराधिकार का अधिकार नहीं, बल्कि संकटग्रस्त परिवार की सहायता के लिए दी जाने वाली विशेष रियायत है। हाल के न्यायिक फैसलों में भी अदालतों ने इस सिद्धांत को दोहराया है।
परिवार की जिम्मेदारी से दूरी बनाई तो नौकरी पर संकट
प्रस्तावित नियमों के अनुसार, अनुकंपा नियुक्ति पाने वाले कर्मचारी को अपने माता-पिता और आश्रित परिवार की देखभाल सुनिश्चित करनी होगी। यदि कोई व्यक्ति नौकरी मिलने के बाद परिवार से अलग हो जाता है या माता-पिता के भरण-पोषण से इनकार करता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। सूत्रों के अनुसार, सरकार इस प्रावधान को इसलिए जोड़ना चाहती है ताकि अनुकंपा नियुक्ति का लाभ केवल व्यक्तिगत रोजगार तक सीमित न रहे, बल्कि पूरा परिवार इसका वास्तविक लाभ प्राप्त कर सके। सामाजिक नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव उन मामलों में प्रभावी साबित हो सकता है जहां नौकरी मिलने के बाद परिवार के बुजुर्ग सदस्य आर्थिक और सामाजिक रूप से असुरक्षित रह जाते हैं।
विभागों की मनमानी पर भी लग सकती है रोक
नए मसौदे में एक और महत्वपूर्ण प्रस्ताव शामिल है। इसके तहत किसी कर्मचारी को केवल तकनीकी कारणों या छोटे प्रशासनिक विवादों के आधार पर नौकरी से हटाना आसान नहीं होगा। यदि कर्मचारी अनुकंपा नियुक्ति के माध्यम से नियुक्त हुआ है, तो संबंधित विभाग को सेवा समाप्त करने के लिए ठोस और गंभीर कारण प्रस्तुत करने होंगे। इससे ऐसे कर्मचारियों को अधिक सेवा सुरक्षा मिलने की संभावना है।
सीपीसीटी की अनिवार्यता खत्म होने की संभावना
अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े सबसे चर्चित प्रस्तावों में कंप्यूटर प्रवीणता एवं प्रमाणन परीक्षा (CPCT) की अनिवार्यता समाप्त करना भी शामिल है। वर्तमान व्यवस्था के तहत नियुक्त कर्मचारी को निर्धारित अवधि में सीपीसीटी उत्तीर्ण करना होता है। सामान्यतः इसके लिए तीन वर्ष का समय मिलता है और विशेष परिस्थितियों में एक वर्ष का अतिरिक्त अवसर दिया जा सकता है। यदि कर्मचारी निर्धारित अवधि में परीक्षा पास नहीं करता, तो उसकी नौकरी प्रभावित हो सकती है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, सामान्य प्रशासन विभाग ने इस विषय पर वित्त विभाग से भी चर्चा की है। यदि यह शर्त हटाई जाती है, तो हजारों आश्रितों को राहत मिल सकती है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और तकनीकी संसाधनों की कमी वाले परिवारों को।
लापता कर्मचारियों से जुड़े मामलों में भी प्रस्तावित बदलाव
मध्य प्रदेश सरकार एक और संवेदनशील विषय पर नियमों की समीक्षा कर रही है। यह उन मामलों से जुड़ा है जहां कोई सरकारी कर्मचारी लापता हो जाता है। अब तक सामान्य रूप से यह माना जाता था कि यदि कोई व्यक्ति सात वर्षों तक लापता रहता है और उसके जीवित होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता, तो उसे मृत मान लिया जाता है। इसके बाद परिवार के पात्र सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की जा सकती है। प्रस्तावित बदलाव के अनुसार यदि सात वर्ष बाद यह पता चलता है कि संबंधित कर्मचारी जीवित है, तो अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति की नौकरी समाप्त की जा सकती है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य नियमों में स्पष्टता लाना और संभावित कानूनी जटिलताओं को कम करना है।
अदालतों ने भी स्पष्ट किए हैं अनुकंपा नियुक्ति के सिद्धांत
हाल के वर्षों में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण फैसलों में कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल तत्काल आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार की सहायता करना है। यह स्थायी अधिकार या विरासत के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालतों ने यह भी माना है कि पात्रता का निर्धारण संबंधित नीति और निर्धारित समयसीमा के आधार पर होना चाहिए। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार द्वारा नियमों को अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक बनाने की कोशिश न्यायिक दृष्टिकोण के अनुरूप हो सकती है।