MP News: सरकारी कर्मचारियों की बढ़ी मुश्किलें, सीआर व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन की तैयारी
MP News: सरकारी नौकरी करने वाले कर्मचारियों के लिए उनकी गोपनीय चरित्रावली यानी सीआर (CR) उनके पूरे करियर की रीढ़ होती है। इसी रिपोर्ट के आधार पर तय होता है कि कर्मचारी को आगे चलकर पदोन्नति मिलेगी या नहीं। लेकिन मध्यप्रदेश के सरकारी महकमों में इन दिनों इस सीआर व्यवस्था को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।
कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि सरकार द्वारा इस साल मार्च में जो निर्देश जारी किए गए थे, उनका पालन कई विभागों में धरातल पर नहीं हो रहा है। इसके कारण कर्मचारियों का भविष्य अधर में लटकता नजर आ रहा है। हालात यह हैं कि कर्मचारी अब चुप बैठने के बजाय अपनी 11 सूत्रीय मांगों को लेकर सीधे सरकार के सामने खड़े होने की तैयारी कर चुके हैं।
बात इस साल मार्च की है, जब राज्य सरकार ने सीआर के प्रकटन, उस पर आपत्ति दर्ज करने और उसे अपग्रेड करने की प्रक्रिया को लेकर नए दिशा-निर्देश तय किए थे। उम्मीद यह थी कि इससे सालों से चली आ रही पुरानी और जटिल प्रक्रिया में सुधार होगा। हालांकि, जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट निकली। अधिकांश सरकारी विभागों में आज भी इन नियमों की अनदेखी की जा रही है।
कर्मचारियों का मुख्य दर्द यह है कि उनकी सीआर में मनमाने तरीके से नंबर काटे जा रहे हैं या प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज की जा रही हैं, जिसकी भनक तक उन्हें समय पर नहीं लगती। जब तक कर्मचारी इस बारे में कुछ समझ पाते हैं, तब तक उनका प्रमोशन रुक चुका होता है या उनके करियर पर दाग लग चुका होता है। इसी व्यवस्थागत खामी के खिलाफ अब राज्यभर के कर्मचारी लामबंद होने लगे हैं।
इस पूरे विवाद को सुलझाने के लिए कर्मचारी संगठनों ने सरकार के सामने छह सूत्रीय प्राथमिक मांगें रखी हैं, जिन पर वे तुरंत लिखित आश्वासन चाहते हैं।
सबसे पहली मांग यह है कि मौजूदा समय में चल रही पदोन्नति की प्रक्रिया पर तब तक अस्थायी रोक लगाई जाए जब तक कि सभी लंबित और विवादित सीआर का सही तरीके से निपटारा नहीं हो जाता। इसके अलावा, कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें अपनी सीआर उसी दिन ऑनलाइन देखने और डाउनलोड करने की सुविधा मिलनी चाहिए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
कोरोना काल के दौरान कई कर्मचारियों को काम करने के बावजूद कम ग्रेडिंग दे दी गई थी, जिसे अब पूरी तरह समाप्त करने की मांग की जा रही है। साथ ही, वर्ष 2023-24 और 2024-25 की सीआर का मूल्यांकन वास्तविक अप्रेजल के आधार पर दोबारा किए जाने की बात कही गई है।
संगठनों का यह भी कहना है कि यदि किसी कर्मचारी को 'ग' या उससे निम्न ग्रेड दिया जाता है, तो इसकी सूचना उसे अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए। इस पूरे मामले की गहराई से जांच के लिए एक तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति के गठन की मांग भी जोर-शोर से उठाई जा रही है।
कर्मचारी संगठनों का रुख इस बार सिर्फ नियमों में सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि वे जवाबदेही तय करने पर भी जोर दे रहे हैं। उनका आरोप है कि कई बार उच्च अधिकारी व्यक्तिगत खुन्नस या दुर्भावना के कारण कर्मचारियों की सीआर खराब कर देते हैं।
इसे रोकने के लिए संगठनों ने मांग की है कि दुर्भावनापूर्ण तरीके से सीआर लिखने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके अलावा, जिन अधिकारियों ने बिना किसी पूर्व नोटिस के कर्मचारियों की फाइल में प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज की हैं, उनकी वेतनवृद्धि रोकने और उन पर आर्थिक दंड लगाने का प्रावधान भी लागू किया जाना चाहिए।
आने वाले समय में इस तरह के विवादों से हमेशा के लिए बचने के लिए कर्मचारी संगठनों ने कुछ ठोस तकनीकी और प्रशासनिक सुझाव दिए हैं। उनका मानना है कि यदि इन सुझावों को मान लिया जाए तो सिस्टम पूरी तरह साफ-सुथरा हो जाएगा।
इन सुझावों में सबसे प्रमुख मांग हर कर्मचारी की पर्सनल लॉगिन आईडी पर सीआर की लाइव ट्रैकिंग और डाउनलोड की सुविधा देना है। इससे कर्मचारी खुद देख सकेगा कि उसकी फाइल किस अधिकारी के पास लंबित है। इसके अलावा, सीआर अपग्रेडेशन के लिए एक निश्चित और कम समय-सीमा तय करने की बात कही गई है। साथ ही, कर्मचारियों द्वारा दिए जाने वाले आवेदनों की ई-फाइल ट्रैकिंग और मासिक प्रगति रिपोर्ट की व्यवस्था को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया है।
फिलहाल कर्मचारी संगठनों ने सरकार को यह अल्टीमेटम दे दिया है कि वे अपनी 11 सूत्रीय मांगों का विस्तृत ज्ञापन सौंपने जा रहे हैं। संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते इन मुद्दों पर संज्ञान नहीं लिया और पारदर्शी व्यवस्था लागू नहीं की, तो राज्य के लाखों कर्मचारी सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होंगे। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस बढ़ते असंतोष को थामने के लिए क्या कदम उठाता है।
