MP promotion case latest update : मध्य प्रदेश के
सरकारी कर्मचारियों के लिए एक और बुरी खबर है। दो लाख से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों का प्रमोशन मामला एक बार फिर कानूनी भूलभुलैया में फंस गया है। इस बार वजह कोई नई याचिका नहीं, बल्कि मामले की सुनवाई कर रहे दोनों जजों का ट्रांसफर है।
फैसला आने ही वाला था, तभी हुआ ट्रांसफर
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ में इस मामले पर लंबी सुनवाई चली। 17 फरवरी 2025 को अंतिम बहस पूरी होने के बाद तत्कालीन एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार सुरक्षित फैसलों को 90 दिनों के भीतर सुनाना जरूरी होता है। इस हिसाब से जून के पहले सप्ताह तक फैसला आने की पूरी उम्मीद थी। लेकिन इसी दौरान चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त कर दिया गया और जस्टिस विनय सराफ का ट्रांसफर इंदौर खंडपीठ में हो गया। यानी फैसला लगभग तैयार था, पर सुनाने वाले ही चले गए।
40 याचिकाएं, एक विवाद प्रमोशन में आरक्षण
यह पूरा मामला राज्य सरकार द्वारा जून 2025 में लागू किए गए 'लोक सेवा पदोन्नति नियमों' को लेकर शुरू हुआ। इन नियमों के खिलाफ कोर्ट में 40 से अधिक याचिकाएं दायर की गईं, जिनका मुख्य विवादित बिंदु था प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था। डॉ. मोहन यादव सरकार ने ये नियम इसलिए बनाए थे क्योंकि 2016 से ही मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन पर रोक लगी हुई है। उस समय शिवराज सिंह चौहान सरकार ने हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की थी, और तब से यह चक्कर चल रहा है।
अब नए सिरे से शुरू होगी सुनवाई
जजों के ट्रांसफर के बाद कानूनी प्रक्रिया फिर से शून्य से शुरू होगी। नई बेंच का गठन होगा, जो पहले पूरी फाइल पढ़ेगी, मामले को समझेगी और फिर सुनवाई शुरू करेगी। कानूनी जानकारों का कहना है कि कम से कम 2 से 4 प्रारंभिक सुनवाइयां फिर से होंगी। इस प्रक्रिया में कुछ और महीने आसानी से निकल सकते हैं। यानी जो कर्मचारी जून 2025 में फैसले की उम्मीद लगाए बैठे थे, उन्हें अब शायद साल के अंत तक इंतजार करना पड़ सकता है।
दस साल बाद भी नहीं मिला इंसाफ
यह स्थिति सिर्फ कानूनी उलझन नहीं है, यह हजारों कर्मचारियों के करियर का सवाल है। पिछले एक दशक में ऐसे अनेक कर्मचारी रिटायर हो चुके हैं जिन्हें कभी प्रमोशन नहीं मिला। पूरी सेवा अपने पद पर बिताना और बिना किसी पदोन्नति के विदाई लेना यह किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिए कड़वा अनुभव है। इससे भी आगे बढ़कर सोचें तो इस गतिरोध का असर नई भर्तियों पर भी पड़ रहा है। जब तक पुराने कर्मचारियों का प्रमोशन नहीं होगा, तब तक निचले स्तर के पद खाली नहीं होंगे। और जब तक पद खाली नहीं होंगे, तब तक नई भर्तियां भी नहीं हो सकतीं। यह एक ऐसा जाम है जिसमें नए और पुराने, दोनों तरह के कर्मचारी फंसे हैं।