MP News Today : मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी भर्ती व्यवस्था और दस्तावेजों की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहली नजर में यह मामला सिर्फ 5 हजार रुपये की रिश्वत का लग रहा था, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, कहानी कहीं ज्यादा बड़ी निकलकर सामने आई। आरोप है कि एक व्यक्ति अपने ही भतीजे की मेडिकल डिग्री और शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल कर सरकारी डॉक्टर बन बैठा और शहडोल, खरगोन तथा श्योपुर जैसे तीन जिलों में नौकरी हासिल कर लंबे समय तक वेतन भी लेता रहा। लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर ने पूरे मामले का रुख बदल दिया। अब यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि पहचान की चोरी, फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल और सरकारी व्यवस्था की निगरानी पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
लोकायुक्त की कार्रवाई बनी पूरे मामले का टर्निंग पॉइंट
रीवा लोकायुक्त ने हाल ही में शहडोल जिले में पदस्थ एक मेडिकल ऑफिसर को 5 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था। उस समय यह मामला सामान्य भ्रष्टाचार का लग रहा था, लेकिन कार्रवाई की तस्वीरें और खबर सोशल मीडिया पर पहुंचते ही एक बड़ा खुलासा हो गया। राजस्थान के भरतपुर निवासी डॉ. महेश चंद्र शर्मा ने सोशल मीडिया पर वायरल फोटो देखी तो उनके होश उड़ गए। तस्वीर में दिख रहा व्यक्ति उनके चाचा सतीश शर्मा थे, लेकिन खबर में नाम उनका यानी डॉ. महेश चंद्र शर्मा का चल रहा था। यहीं से पूरे मामले की असली कहानी सामने आने लगी।
राजस्थान में नौकरी कर रहे असली डॉक्टर ने दर्ज कराई शिकायत
डॉ. महेश चंद्र शर्मा ने तुरंत मध्य प्रदेश पहुंचकर जयसिंहनगर थाने में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने पुलिस को बताया कि वे पिछले चार-पांच वर्षों से राजस्थान के डीग जिले के पूछरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में मेडिकल ऑफिसर के रूप में कार्यरत हैं। उनका कहना है कि उन्होंने कभी मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी नहीं की। इसके बावजूद उनके नाम और शैक्षणिक दस्तावेजों का कथित रूप से इस्तेमाल कर कोई दूसरा व्यक्ति सरकारी डॉक्टर बनकर नौकरी करता रहा। शिकायत के बाद पुलिस और संबंधित विभाग ने मामले की जांच शुरू कर दी है।
भतीजे की डिग्री, चाचा की पहचान! आरोपों ने बढ़ाई गंभीरता
शिकायत के मुताबिक, सतीश शर्मा ने कथित तौर पर अपने भतीजे के मेडिकल प्रमाणपत्र और शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल किया, जबकि पहचान के लिए अपना आधार कार्ड लगाया। इसी आधार पर वह शहडोल जिले के जयसिंहनगर विकासखंड के उफरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मेडिकल ऑफिसर के पद पर कार्यरत रहे। दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि परिवार के लोगों को उन्होंने बताया था कि वे राजस्थान के कोटा में किसी कोचिंग संस्थान में नौकरी करते हैं। इससे परिवार को भी लंबे समय तक इस कथित फर्जीवाड़े की जानकारी नहीं हो सकी।
तीन जिलों में एक साथ नौकरी और वेतन लेने के आरोप
जांच के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि संबंधित व्यक्ति की पदस्थापना एक साथ शहडोल, खरगोन और श्योपुर में दर्ज बताई जा रही है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार फरवरी 2023 से उसकी नियुक्ति खरगोन जिले के सेगांव ब्लॉक में भी दर्ज थी। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर यह जानकारी सही साबित होती है तो एक ही व्यक्ति तीन अलग-अलग जिलों में एक साथ सरकारी सेवा कैसे दे रहा था? क्या तीनों जगह से वेतन भी लिया गया? इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होंगे।