भोपाल में तीन दिन बाद कचरे से मिली राहत, सफाई कर्मचारियों की हड़ताल खत्म होते ही रातभर चला सफाई अभियान
Mp News अरे भैया, पिछले तीन दिन तो भोपाल वालों पर भारी पड़े। गली में निकलो तो बदबू के मारे नाक दबानी पड़ती थी। दिवाली का त्योहार सिर पर था और शहर कचरे के ढेर में घिरा पड़ा था। बाजार में खरीदारी करने गए तो सड़क किनारे कचरे के पहाड़ दिखे। कुछ लोग तो मजबूरी में घर से निकलते ही नहीं थे। अब शुक्रवार रात को खबर आई कि सफाई कर्मचारियों की हड़ताल खत्म हो गई है, तो लोगों ने चैन की सांस ली। बदबू अब धीरे-धीरे कम हो रही है।
असल बात ये है कि मध्य प्रदेश के नगर निकायों में काम करने वाले सफाई कर्मचारियों ने 4 नवंबर से अनिश्चितकाल की हड़ताल शुरू कर दी थी। उनकी मांगें सीधी-सादी थीं। तनख्वाह बढ़े, नौकरी पक्की हो, ठेका प्रथा खत्म हो और अनुकंपा नियुक्ति मिले। ये लड़ाई अखिल भारतीय सफाई मजदूर ट्रेड यूनियन के झंडे तले लड़ी गई। प्रदेश में हजारों कर्मचारी काम पर नहीं गए। भोपाल में करीब ढाई हजार टन कचरा जमा हो गया। न्यू मार्केट, वल्लभ भवन और चार इमली जैसी जगहों पर तो हालत और बिगड़ गई।
शुक्रवार शाम को राज्य मंत्री कृष्णा गौर के बीच में पड़ने से कर्मचारियों का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिला। वहां दस मांगें रखी गईं। यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष मगनलाल झांझोट बताते हैं कि इनमें से आठ मांगों पर सहमति बन गई। पक्की नौकरी के मामले में एक ऊंचे स्तर की कमेटी बनेगी, जो एक महीने में आगे का काम करेगी। 25 दिन काम करने वालों की तनख्वाह 18 से 20 हजार रुपये तक करने पर भी बात बन गई। रोज की दिहाड़ी पर काम करने वालों को नियमित करने का काम भी शुरू होगा।
मुलाकात के तुरंत बाद यूनियन ने हड़ताल वापस लेने का ऐलान कर दिया। कर्मचारी बोले कि अब वो काम पर लौट रहे हैं। रात में ही भोपाल में सफाई अभियान शुरू हो गया। जिला कलेक्टर प्रियंक मिश्रा खुद नंबर 10 मार्केट पहुंचे और कर्मचारियों के साथ कचरा उठवाने लगे। मेयर और नगर निगम के अफसर भी झाड़ू लेकर सड़क पर उतरे। पूरी रात गाड़ियां चलीं और मुख्य सड़कों, बाजारों और मोहल्लों से कचरा हटाने का काम जोरों पर रहा।
सोचने वाली बात ये है कि तीन दिन की हड़ताल ने सबको दिखा दिया कि शहर की साफ-सफाई कितनी नाजुक चीज पर टिकी है। भोपाल में रोज आठ-नौ सौ टन कचरा निकलता है। त्योहार में ये मात्रा और बढ़ जाती है। जैसे ही कर्मचारी हाथ खींचते हैं, ढेर लगने लगते हैं। कुछ इलाकों में लोगों ने मजबूरी में खुद कचरा जला दिया, तो कहीं पानी की सप्लाई पर भी असर पड़ा।
सफाई कर्मचारी तो सुबह से शाम तक झाड़ू लगाते हैं, नालियां साफ करते हैं, कचरा उठाते हैं। गर्मी हो या बरसात, वो अपनी ड्यूटी पर रहते हैं। फिर भी कम तनख्वाह और पक्की नौकरी न मिलने की शिकायत बरसों से चली आ रही है। इस बार उन्होंने एक जुट होकर आवाज उठाई और सरकार ने उनकी बात सुनी। कमेटी बन गई है। अब देखना है कि नियमितीकरण का काम कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से होता है।
शनिवार सुबह से भोपाल के कई इलाकों में सफाई दिखने लगी है। लोग कह रहे हैं कि अब सांस लेने में आसानी होगी। भीड़ भरे बाजारों में साफ सड़कें हों तो खरीदारी का मजा भी आएगा। दिवाली से पहले ये राहत बड़ी चीज है। लेकिन एक बार की सफाई से काम नहीं चलेगा। रोज की व्यवस्था पटरी पर लानी होगी। प्रशासन का कहना है कि जब तक जमा कचरा पूरी तरह साफ नहीं होगा, तब तक दिन-रात काम चलता रहेगा।
इस पूरे मामले से एक बात तो साफ हो गई कि सफाई कर्मचारी शहर की नींव हैं। उनके बिना शहर गंदगी में डूब जाता है। उनकी मांगें कितनी जायज हैं, इस पर अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन तीन दिन में जो हाल हुआ, वो किसी को अच्छा नहीं लगा। अब समझौता हो गया है, तो दोनों तरफ से जिम्मेदारी निभानी होगी। कर्मचारी काम पर लौटें और सरकार अपने वादे निभाए, तभी शहर लंबे समय तक साफ रहेगा।
मध्य प्रदेश के दूसरे शहरों में भी हालात सुधरने लगे हैं। जहां-जहां कर्मचारी लौटे हैं, वहां सफाई शुरू हो गई है। भोपाल में कलेक्टर और मेयर का खुद झाड़ू लेकर उतरना एक संदेश देता है कि प्रशासन इस मुद्दे को गंभीरता से ले रहा है। आम आदमी के लिए सबसे बड़ी बात यही है कि अब घर के बाहर कचरे का ढेर नहीं दिखेगा, सड़कें साफ रहेंगी और त्योहार का माहौल भी अच्छा रहेगा।
हड़ताल का सबसे ज्यादा असर राजधानी भोपाल में दिखा। कई इलाकों में घरों से कचरा उठाने वाली गाड़ियां पहुंची ही नहीं। बाजार, कॉलोनी और मुख्य सड़कें गंदगी से भर गईं। जो सड़कें आम दिनों में चमचमाती दिखती हैं, वो भी कचरे के ढेर से घिर गईं। एक रिपोर्ट के मुताबिक हड़ताल के दौरान भोपाल में करीब 2,550 टन कचरा जमा हो गया था। कचरा उठाने वाली 400 से ज्यादा गाड़ियां खड़ी रहीं। आम दिनों में ये गाड़ियां रोज दो-तीन चक्कर लगाकर शहर से कचरा इकट्ठा करती हैं। शहर के 17 कचरा ट्रांसफर स्टेशनों पर भी इसका बुरा असर पड़ा।
अब बस इंतजार है कि कमेटी अपनी रिपोर्ट कितनी जल्दी देती है और नियमितीकरण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है। सफाई कर्मचारी बरसों से इसी घड़ी का इंतजार कर रहे थे। इस बार उनकी आवाज सुनी गई है, और उम्मीद है कि आगे भी उनकी समस्याओं को अनसुना नहीं किया जाएगा। शहर की सफाई सिर्फ कर्मचारियों का काम नहीं है। ये पूरे समाज और प्रशासन की साझा जिम्मेदारी है। तीन दिन की परेशानी के बाद अब राहत मिली है, और इसे लंबे समय तक बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।
