सागा ग्रुप का 10 हजार करोड़ का खेल उजागर, ED के छापे में मिला सोना-चांदी और करोड़ों कैश
ED Raid : भोपाल-इंदौर के गली-मोहल्लों में जिन लोगों ने सागा ग्रुप की स्कीम में पाई-पाई जोड़कर पैसा लगाया था, उनके लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने इस ग्रुप के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की है, जिसने पूरे मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में हलचल मचा दी है।
मामला है करीब 10 हजार करोड़ रुपए के कथित निवेश घोटाले का। 13 से 16 अगस्त के बीच ED की टीमों ने मुंबई और भोपाल में सागा ग्रुप के संचालक समीर अग्रवाल और उनके करीबियों के घर और दफ्तर खंगाले।
चार दिन चली छापेमारी में क्या-क्या मिला
धन शोधन निवारण अधिनियम यानी PMLA के तहत हुई इस कार्रवाई में जांच एजेंसी के हाथ बड़ी रकम और संपत्ति लगी। तलाशी में 30 करोड़ रुपए से ज्यादा के शेयर, सिक्योरिटीज, म्यूचुअल फंड और LIC पॉलिसियां मिलीं।
इसके साथ ही 9 महंगी गाड़ियां भी जब्त की गई हैं। नकद के मामले में भी आंकड़ा चौंकाने वाला है। घरों और दफ्तरों से 1.53 करोड़ रुपए नकद और करीब 35 लाख की विदेशी मुद्रा बरामद हुई।
सोने-चांदी की बात करें तो टीम को 5.25 करोड़ रुपए कीमत की सिल्लियां और गहने मिले। अब तक की कुल जब्त और फ्रीज संपत्ति का आंकड़ा 37 करोड़ रुपए के आसपास बताया जा रहा है, जो शुरुआती अनुमान से भी ज्यादा निकला है।
50 से ज्यादा शेल कंपनियों का जाल
ED की जांच में जो बात सबसे ज्यादा हैरान करने वाली है, वह है इस ग्रुप का नेटवर्क। एजेंसी के मुताबिक 50 से अधिक शेल कंपनियों के जरिए यह पूरा खेल चलाया जा रहा था।
तरीका भी बड़ा सोचा-समझा था। इलाके के कैश कलेक्टर लोगों से सीधे नकद जमा करते थे, फिर वह पैसा घुमा-फिराकर प्रमोटरों तक पहुंचाया जाता था। इस पूरी चेन में असली मालिकों तक पैसा पहुंचने का सीधा सुराग मिलना मुश्किल हो जाता था।
कौन है समीर अग्रवाल
ED के दस्तावेजों में समीर अग्रवाल को सागा ग्रुप का चेयरमैन-सह-मैनेजिंग डायरेक्टर और मुख्य नियंत्रक बताया गया है। जांच एजेंसी का कहना है कि वह फिलहाल देश छोड़कर विदेश जा चुका है और फरार है।
एजेंसी दो अलग-अलग प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर के जरिए उसकी संपत्तियां पहले ही अटैच कर चुकी है। ग्रुप के एक और अहम पदाधिकारी रवि शंकर तिवारी को इसी मामले में 14 जुलाई 2026 को गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ 24 जुलाई को विशेष अदालत में अभियोजन शिकायत भी दाखिल हो चुकी है।
लोनी अरबन सोसाइटी से शुरू हुई थी कहानी
जांच में सामने आया कि यह पूरा मामला "द लोनी अर्बन मल्टी-स्टेट क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी" और उससे जुड़ी अन्य सहकारी समितियों से जुड़ा है। इन्हीं सोसाइटियों की आड़ में लोगों से निवेश जुटाया जा रहा था।
बताया जाता है कि 2009 से इस समूह ने रेकरिंग डिपॉजिट, फिक्स्ड डिपॉजिट और मंथली इनकम स्कीम के नाम पर आम लोगों को अपनी तरफ खींचा। स्कीम में शामिल होने पर 3 से 5 साल में पैसा दोगुना-तिगुना करने का सपना दिखाया जाता था।
कई जगह तो कार और महंगे तोहफे देने का लालच भी दिया गया, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ें। यही वजह रही कि गांव-कस्बों से लेकर शहरों तक हजारों परिवारों ने अपनी जमापूंजी इस स्कीम में झोंक दी।
कई राज्यों में पहले से दर्ज हैं शिकायतें
यह मामला अचानक सामने नहीं आया। ED की जांच का आधार वे कई एफआईआर हैं, जो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश समेत अलग-अलग राज्यों की पुलिस पहले ही दर्ज कर चुकी थी। इन्हीं शिकायतों की कड़ी जोड़कर जांच एजेंसी इस पूरे नेटवर्क तक पहुंची।
निवेशकों की मानें तो कई लोगों ने अपनी पेंशन, बेटी की शादी के लिए जोड़ी रकम या खेती-किसानी से मिली कमाई तक इस स्कीम में डाल दी थी। अब जब मामला उजागर हुआ है, तो उनकी सबसे बड़ी चिंता यही है कि उनका पैसा वापस मिलेगा या नहीं।
