एमपी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 10 साल से काम कर रहे संविदाकर्मियों को मिलेगा पक्का हक और न्यूनतम वेतन
अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन और आर्थिक न्याय से वंचित नहीं रखा जा सकता है।
MP High Court Decision : मध्यप्रदेश में वर्षों से काम कर रहे संविदा, आउटसोर्स और अंशकालिक कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है। जबलपुर स्थित हाईकोर्ट ने साफ किया है कि 10 साल से अधिक समय से लगातार सेवा दे रहे कर्मचारियों को वर्गीकरण और न्यूनतम वेतन सहित अन्य लाभ मिलना चाहिए। न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने यह आदेश याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें कर्मचारियों ने भेदभाव और अधिकारों के उल्लंघन की बात उठाई थी। अदालत ने सरकार को 2016 की नीति के अनुसार पात्र कर्मचारियों को लाभ देने के निर्देश भी दिए हैं।
लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों को राहत
मध्यप्रदेश के अलग-अलग विभागों में कार्यरत कई संविदाकर्मियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इन कर्मचारियों का कहना था कि उन्हें साल 2009 में अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया था और तब से वे लगातार अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
इसके बावजूद उन्हें स्थायी कर्मचारियों के समान वेतन और सुविधाएं नहीं मिल रही थीं। अदालत ने इन दलीलों को गंभीरता से लिया और माना कि लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों के साथ न्याय होना जरूरी है।
आर्थिक न्याय और सम्मानजनक जीवन का अधिकार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि किसी भी कर्मचारी को लंबे समय तक काम लेने के बाद उचित वेतन और सुविधाओं से वंचित नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे कर्मचारियों को आर्थिक न्याय मिलना चाहिए, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। इसके लिए जरूरी है कि उन्हें उनकी भूमिका और अनुभव के अनुसार वर्गीकृत किया जाए और न्यूनतम वेतन दिया जाए।
सरकार की नीति लागू करने के निर्देश
सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि राज्य सरकार ने पहले ही कर्मचारियों के वर्गीकरण और न्यूनतम वेतन को लेकर नीति बनाई हुई है, लेकिन उसका सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है।
हाईकोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि 2016 की नीति के तहत पात्र कर्मचारियों का वर्गीकरण किया जाए और उन्हें सभी परिणामी लाभ दिए जाएं। इसमें न्यूनतम वेतन, सेवा शर्तों में सुधार और अन्य जरूरी सुविधाएं शामिल हैं।
संवैधानिक अधिकारों का भी उठा मुद्दा
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि उनके साथ हो रहा भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है, जो समानता और समान अवसर का अधिकार देते हैं।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को उचित मानते हुए कहा कि पात्र कर्मचारियों को नीति के अनुसार लाभ देना सरकार की जिम्मेदारी है और इसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए।












