रेत ठेकेदारों सावधान! सरकार ने बिछाया नियमों का जाल, एक गलती और खाली हो जाएगी जेब
MP Sand Mining Policy 2026 : मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने रेत खनन के कारोबार को लेकर एक बहुत ही सख्त और बड़ा फैसला लिया है। प्रदेश में अब रेत खदानों का ठेका लेकर उसे बीच में ही छोड़ देना ठेकेदारों के लिए कोई आसान रास्ता नहीं रह गया है। खनिज विभाग ने अपनी नियमावली में कुछ ऐसे कड़े बदलाव किए हैं
जिनसे अब उन ठेकेदारों की नींद उड़ने वाली है जो मुनाफे के समय तो काम करते थे लेकिन थोड़ी सी भी मुश्किल आने पर अपना ठेका सरेंडर कर देते थे। सरकार के इस कदम का सीधा मतलब यह है कि अगर आप रेत के धंधे में उतर रहे हैं तो आपको पूरी जिम्मेदारी के साथ अपना कार्यकाल पूरा करना होगा वरना जेब पर भारी चपत लगना तय है।
यह बदलाव मुख्य रूप से ‘मध्य प्रदेश रेत खनन, परिवहन, भंडारण एवं व्यापार नियम’ के तहत किए गए हैं। सरकार का मानना है कि ठेकेदारों द्वारा बीच में काम छोड़ देने से न केवल राजस्व का नुकसान होता है बल्कि पूरी नीलामी प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने में समय और सरकारी संसाधन भी बर्बाद होते हैं। अब नए नियमों के आने के बाद ठेकेदारों को कोई भी कदम उठाने से पहले दस बार सोचना पड़ेगा क्योंकि सरकार ने नुकसान की भरपाई का पूरा जिम्मा अब पुराने ठेकेदार के कंधों पर ही डाल दिया है।
राजस्व के नुकसान की भरपाई अब ठेकेदार की जेब से
सबसे बड़ा और सबसे चौंकाने वाला बदलाव उस स्थिति के लिए है जब कोई ठेकेदार अपना अनुबंध पूरा होने से पहले ही काम छोड़ देता है। अक्सर देखा जाता था कि जब रेत के दाम गिरते थे या मांग कम होती थी तो ठेकेदार घाटे से बचने के लिए ठेका सरेंडर कर देते थे। इसके बाद सरकार को उस खदान की फिर से नीलामी करनी पड़ती थी। कई बार दोबारा होने वाली इस नीलामी में सरकार को पिछली बार के मुकाबले कम बोली मिलती थी जिससे सरकारी खजाने को सीधा नुकसान होता था।
अब खनिज विभाग ने नियम बनाया है कि यदि नए ठेके में सरकार को कम राजस्व प्राप्त होता है तो उस कमी या अंतर की पूरी राशि पुराने ठेकेदार से वसूली जाएगी। मान लीजिए कि किसी ठेकेदार ने कोई खदान 10 करोड़ रुपये में ली थी और उसने बीच में ही उसे छोड़ दिया।
अब अगर दोबारा हुई नीलामी में वह खदान केवल 8 करोड़ रुपये में नीलाम होती है तो बचे हुए 2 करोड़ रुपये का अंतर उस पुराने ठेकेदार को भरना होगा जिसने काम बीच में छोड़ा था। यह नियम ठेकेदारों को मैदान छोड़कर भागने से रोकने के लिए एक बड़े वित्तीय कवच की तरह काम करेगा।
एक साल तक खदान छोड़ना अब मुमकिन नहीं
सरकार ने रेत माफिया और गैर-गंभीर ठेकेदारों पर लगाम लगाने के लिए एक और महत्वपूर्ण शर्त जोड़ दी है जिसे ‘लॉक-इन’ पीरियड कहा जा रहा है। अब कोई भी ठेकेदार खदान का ठेका मिलने के बाद कम से कम एक साल तक उसे सरेंडर नहीं कर सकेगा। पहले के समय में ठेकेदार कुछ महीनों तक काम करते थे और जैसे ही उन्हें लगता था कि बाजार में उनकी पकड़ ढीली हो रही है वे तुरंत समर्पण का रास्ता चुन लेते थे।
इस एक साल की अनिवार्य अवधि का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वही लोग इस क्षेत्र में आएं जिनके पास पर्याप्त अनुभव और संसाधन हों। सरकार चाहती है कि रेत का कारोबार केवल कुछ समय के मुनाफे का जरिया न बनकर एक व्यवस्थित उद्योग के रूप में चले।
इस नियम से उन लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी होगी जो बाजार की स्थितियों का फायदा उठाकर छोटे समय के लिए निवेश करते थे और फिर गायब हो जाते थे। अब एक साल तक उन्हें हर हाल में खदान का संचालन करना ही होगा।
नीलामी के लिए शुरुआती कीमत का नया गणित
खनिज विभाग ने अब रेत खदानों के लिए एक समान और पारदर्शी प्रारंभिक आधार मूल्य तय करने का फैसला लिया है। इसके लिए एक नया फॉर्मूला पेश किया गया है जो सीधा और स्पष्ट है। अब किसी भी रेत समूह की शुरुआती बोली की कीमत वहां मौजूद रेत की कुल मात्रा के आधार पर तय की जाएगी।
नियम यह कहता है कि खदान में उपलब्ध रेत की कुल मात्रा को 250 से गुणा किया जाएगा और जो परिणामी राशि आएगी वही उस खदान का शुरुआती आधार मूल्य होगा।
इसे गणितीय रूप में इस तरह समझा जा सकता है कि यदि किसी खदान में उपलब्ध रेत की कुल मात्रा को हम V (घन मीटर में) मान लें तो उस खदान की प्रारंभिक आधार कीमत V X 250 रुपये होगी। यह नया सिस्टम आने से अब अलग-अलग जिलों और क्षेत्रों में आधार मूल्य को लेकर होने वाली विसंगतियां खत्म हो जाएंगी और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी। ठेकेदारों को अब पहले से ही पता होगा कि उन्हें किस कीमत से अपनी बोली शुरू करनी है और सरकार को भी एक निश्चित आय की गारंटी मिलेगी।
पुनः नीलामी पर लगेगा 10 प्रतिशत का अतिरिक्त बोझ
सरकार ने उन ठेकेदारों के लिए भी सजा का प्रावधान किया है जिनकी वजह से किसी खदान की दोबारा नीलामी की नौबत आती है। संशोधित नियमों के अनुसार यदि कोई ठेकेदार अपना ठेका समर्पित कर देता है और उस खदान की फिर से नीलामी होती है तो उसकी आधार कीमत में भारी इजाफा किया जाएगा। विभाग ने तय किया है कि मूल अनुबंध की तारीख से लेकर समर्पण की तारीख तक के हर साल के लिए आधार मूल्य में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाएगी।
यह 10 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि इसलिए की गई है ताकि समय के साथ बढ़ने वाली महंगाई और प्रशासनिक खर्चों की भरपाई हो सके। साथ ही यह पुराने ठेकेदार के लिए एक चेतावनी की तरह भी है क्योंकि नीलामी की कीमत जितनी ज्यादा होगी उतना ही उसके लिए नुकसान की भरपाई करने का जोखिम बढ़ जाएगा।













