प्रशासन की अकड़ या संत का हठ? माघ मेले की पवित्रता पर भारी पड़ा अविमुक्तेश्वरानंद और सरकार का आपसी विवाद
क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की माफी वाली जिद प्रशासन के नियमों से ऊपर है या पुलिसिया तंत्र ने संतों का अपमान कर सनातन की मर्यादा लांघी है?
Swami Avimukteshwaranand controversy : प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में आस्था और भक्ति का संगम तो दिख रहा है, लेकिन इसके पीछे छिपी सियासत और व्यक्तिगत अहंकार की लड़ाई ने पवित्रता पर कालिख पोत दी है। जहाँ लाखों श्रद्धालु कड़ाके की ठंड में संगम की लहरों में पुण्य तलाश रहे हैं, वहीं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच की ठन गई है।
यह विवाद अब केवल एक धार्मिक स्नान का नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर सत्ता और संन्यास के बीच की तनातनी बन चुका है। बसंत पंचमी जैसे पावन मौके पर जब हर सनातनी डुबकी लगाने को बेताब है, तब एक धर्माचार्य का जिद पर अड़ जाना और प्रशासन का माफी मांगने से इनकार करना इस पूरे आयोजन की साख पर सवाल खड़ा करता है।
परंपरा और अहंकार के बीच फंसा संगम स्नान
माघ मेले के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक बसंत पंचमी पर लाखों लोग संगम तट पर उमड़ पड़े हैं। सुबह चार बजे से ही हर-हर गंगे के जयघोष के साथ श्रद्धालु रेती पर पुण्य बटोर रहे हैं, लेकिन ज्योतिष्पीठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर में सन्नाटा और रोष पसरा है।
स्वामी का साफ कहना है कि जब तक प्रशासन अपनी बदसलूकी के लिए सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता, वे बसंत पंचमी का स्नान नहीं करेंगे। प्रशासन केवल कागजी नोटिस का खेल खेल रहा है और अपनी गलती सुधारने के बजाय इसे दबाने की कोशिश में लगा है। यह महज एक स्नान का बहिष्कार नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को सीधी चुनौती है जो धर्म के नाम पर संतों का अपमान करने का दुस्साहस करती है।
मुख्यमंत्री का ‘कालनेमि’ वाला वार और सत्ता की सख्ती
इस पूरे विवाद में तब और आग लग गई जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए एक बड़ा प्रहार कर दिया। मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि किसी को भी सनातन धर्म की स्थापित परंपराओं के साथ खिलवाड़ करने या उनमें बाधा डालने का हक नहीं है। उन्होंने ‘कालनेमि’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर यह संकेत दे दिया कि धर्म की आड़ में षड्यंत्र रचने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सरकार का रुख स्पष्ट है कि कानून और नियम सबके लिए बराबर हैं, चाहे वह कोई आम आदमी हो या कोई बड़ा संत। प्रशासन ने भी अब नरम रुख छोड़कर नोटिस थमाना शुरू कर दिया है, जिससे टकराव के और बढ़ने के आसार हैं।
सरकार में दो फाड़? केशव मौर्य का नरम दांव
दिलचस्प बात यह है कि जहाँ एक तरफ मुख्यमंत्री का रुख बेहद कड़ा है, वहीं डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का अंदाज एकदम जुदा नजर आया। आज़मगढ़ में उन्होंने जिस तरह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ‘पूज्य शंकराचार्य जी’ कहकर संबोधित किया और उनके चरणों में नमन करने की बात कही, उसने सबको हैरान कर दिया।
मौर्य ने बड़े ही विनम्र भाव से स्वामी से स्नान करने और विवाद खत्म करने की अपील की। यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि सरकार के भीतर इस मुद्दे को लेकर दो तरह की सोच चल रही है। एक तरफ अनुशासन का चाबुक है, तो दूसरी तरफ संतों को साधने की राजनीतिक मजबूरी।
आखिर कहाँ से शुरू हुई यह पूरी रार?
इस पूरी लड़ाई की जड़ 18 जनवरी यानी मौनी अमावस्या के दिन हुई एक घटना में छिपी है। उस दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में बैठकर स्नान के लिए जाना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने सुरक्षा और नियमों का हवाला देकर उन्हें रोक दिया। पुलिस का कहना था कि वे पैदल जाएं, लेकिन स्वामी के समर्थकों को यह नागवार गुजरा।
धक्का-मुक्की हुई, कहासुनी बढ़ी और देखते ही देखते यह मामला एक बड़े धरने में तब्दील हो गया। तब से लेकर आज तक यह गुस्सा शांत नहीं हुआ है। बाबा रामदेव और सतुआ बाबा जैसे अन्य संत भी संगम में डुबकी लगा चुके हैं, लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद की जिद ने प्रशासन की नाक में दम कर रखा है। क्या एक माफीनामा आस्था से बड़ा हो गया है या फिर प्रशासन की तानाशाही ने संतों को इस हद तक मजबूर कर दिया है?












