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नरसिंहपुर में बड़ा ड्रामा: कलेक्टर तक लगाई गुहार पर नहीं मिली मदद, सरपंच महेंद्र कुशवाहा ने उठाया खौफनाक कदम

नरसिंहपुर के सीरेगांव सरपंच महेंद्र कुशवाहा ने विकास कार्यों में प्रशासनिक सहयोग न मिलने और सुनवाई न होने से तंग आकर खुद को पंचायत भवन में कैद कर आत्मदाह की चेतावनी दी है।

Narsinghpur News Today : मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक छोटे प्रतिनिधि की बेबसी को भी उजागर किया है। यह मामला चीचली जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले सीरेगांव का है, जहां के सरपंच महेंद्र कुशवाहा ने खुद को पंचायत भवन के भीतर कैद कर लिया है।

एक जनप्रतिनिधि का इस तरह अपने ही कार्यालय को कैदखाने में बदल लेना और आत्मदाह जैसी खौफनाक चेतावनी देना यह बताता है कि जमीनी स्तर पर सिस्टम और जन प्रतिनिधियों के बीच तालमेल की स्थिति कितनी खराब हो चुकी है। यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति के विरोध का तरीका नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक सुस्ती और अनदेखी की कहानी है जिससे एक सरपंच पिछले दो सालों से जूझ रहा है।

नरसिंहपुर में प्रशासनिक अनदेखी के खिलाफ सरपंच का बड़ा कदम

मंगलवार की रात सीरेगांव के पंचायत भवन में जो हुआ वह हैरान करने वाला था। सरपंच महेंद्र कुशवाहा ने खुद को कमरे में बंद किया और साफ कह दिया कि अब उनके पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। सरपंच का आरोप है कि गांव के विकास कार्यों को लेकर वे लंबे समय से परेशान हैं।

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एक सरपंच की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने गांव की सड़कों, नालियों, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त रखे, लेकिन महेंद्र कुशवाहा के मुताबिक उन्हें काम ही नहीं करने दिया जा रहा है। जब एक चुना हुआ प्रतिनिधि खुद को असुरक्षित और असहाय महसूस करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं।

महेंद्र कुशवाहा ने अपनी इस नाराजगी और बेबसी को एक वीडियो के जरिए भी साझा किया है जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में उनकी आवाज में जो दर्द और गुस्सा है, वह सीधे तौर पर जिला प्रशासन और बड़े अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वे पिछले दो वर्षों से लगातार कोशिश कर रहे हैं कि गांव के रुके हुए निर्माण कार्य शुरू हो सकें और जनता को राहत मिले, लेकिन सरकारी फाइलों के अंबार और अधिकारियों की उदासीनता ने उनके हर प्रयास पर पानी फेर दिया है।

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दो साल का संघर्ष और जनसुनवाई की नाकामी

सरपंच महेंद्र कुशवाहा का कहना है कि उन्होंने कलेक्टर से लेकर तमाम आला अधिकारियों के दरवाजे खटखटाए हैं। मध्य प्रदेश में सरकार ने ‘जनसुनवाई’ नाम का एक मंच बनाया है ताकि आम आदमी की शिकायतों का तुरंत निराकरण हो सके।

महेंद्र भी इसी उम्मीद के साथ पिछले मंगलवार को जनसुनवाई में पहुंचे थे। उन्होंने अपनी समस्याओं का एक लिखित आवेदन अधिकारियों को सौंपा, लेकिन उनका आरोप है कि वहां उन्हें सिर्फ आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। सरपंच ने तो यहां तक कहा कि उन्हें अधिकारियों के सामने अपमानित और प्रताड़ित भी होना पड़ा है।

एक सरपंच के लिए यह स्थिति बहुत विकट होती है। गांव के लोग अपने सरपंच से उम्मीद करते हैं कि वह उनके काम करवाएगा, लेकिन जब प्रशासन का सहयोग नहीं मिलता, तो सरपंच जनता की नजरों में भी अपनी साख खोने लगता है। महेंद्र कुशवाहा के मामले में भी यही हुआ।

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दो साल तक लगातार आवेदन देने और विनती करने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने अपनी जान देने तक की बात कह दी। उनका कहना है कि अगर प्रशासन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं करता है, तो वे पंचायत भवन के अंदर ही आत्मदाह कर लेंगे और इसका पूरा जिम्मेदार शासन-प्रशासन होगा।

आखिर क्यों ठप पड़े हैं विकास कार्य

ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों के रुकने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें बजट की कमी, तकनीकी स्वीकृति में देरी या प्रशासनिक अधिकारियों का नकारात्मक रवैया शामिल होता है। सीरेगांव के सरपंच का दावा है कि उन्हें विकास कार्यों में सहयोग नहीं मिल रहा है।

अक्सर यह देखा जाता है कि पंचायत स्तर पर काम करने के लिए सचिव, इंजीनियर और जनपद स्तर के अधिकारियों की मंजूरी जरूरी होती है। अगर इनमें से कोई भी कड़ी सहयोग न करे, तो सरपंच चाहकर भी गांव की एक ईंट नहीं लगवा सकता।

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महेंद्र कुशवाहा की मांग बहुत सरल है उन्हें उनके गांव में काम करने दिया जाए और प्रशासन विकास के कार्यों में अड़ंगा डालने के बजाय सहयोग करे। एक लोकतांत्रिक देश में अगर किसी प्रतिनिधि को काम करने के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़ रही है, तो यह प्रशासन की सबसे बड़ी असफलता मानी जाएगी। इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या कागजों पर होने वाली जनसुनवाई वाकई लोगों की मदद कर रही है या यह सिर्फ एक रस्म अदायगी बनकर रह गई है।

वायरल वीडियो और प्रशासन में मचा हड़कंप

जैसे ही सरपंच का खुद को कैद करने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर फैला, प्रशासन में हड़कंप मच गया। रात के समय ही स्थानीय स्तर के अधिकारियों ने सरपंच से बात करने की कोशिश की, लेकिन महेंद्र अपनी मांग पर अड़े हुए हैं। गांव के लोग भी पंचायत भवन के बाहर जमा हो गए हैं और इलाके में तनाव का माहौल बना हुआ है। लोग यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर नौबत यहां तक कैसे पहुंची कि एक व्यक्ति को इतना बड़ा आत्मघाती फैसला लेना पड़ा।

Alok Singh

मेरा नाम आलोक सिंह है मैं भगवान नरसिंह की नगरी नरसिंहपुर से हूं ।और पत्रकारिता में मास्टर डिग्री हासिल करने के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में आया था ।मुझे पत्रकारिता मैं इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया का 20 वर्ष का अनुभव है खबरों को प्रमाणिकता के साथ लिखने के हुनर में माहिर हूं।

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