अपराधियों की अब खैर नहीं! MP पुलिस तैयार कर रही है बदमाशों का ‘डिजिटल DNA’, ऐसे होगी पहचान।
- एनसीआरबी के एमसीयू प्रोजेक्ट के तहत अपराधियों का डिजिटल डेटाबेस तैयार हो रहा है।
- इसमें डीएनए, रेटिना स्कैन और चलने के अंदाज (Gait Pattern) का रिकॉर्ड रखा जाएगा।
- डेटा को सीबीआई और एनआईए जैसी केंद्रीय एजेंसियों के साथ साझा किया जाएगा।
- मध्य प्रदेश के 450 थानों और 125 जेलों में यह हाईटेक सिस्टम लागू किया जा रहा है।
- एमपी पुलिस ने ड्रोन जैसे आधुनिक खतरों के लिए एनएसजी से विशेष ट्रेनिंग भी पूरी की है।
Criminal digital profiling India : मध्य प्रदेश सहित देशभर में अब शातिर अपराधियों का बच निकलना नामुमकिन होने वाला है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने एक ऐसा आधुनिक सॉफ्टवेयर तैयार किया है, जिससे गिरफ्तार किए गए हर व्यक्ति की ‘डिजिटल क्राइम प्रोफाइल’ बनाई जा रही है।
इस नई व्यवस्था को ‘मैजरमेंट कलेक्शन यूनिट’ (MCU) प्रोजेक्ट का नाम दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य अपराधियों की एक ऐसी पहचान स्थापित करना है जिसे वे कभी बदल न सकें। मध्य प्रदेश पुलिस ने इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाते हुए अब तक 7500 से ज्यादा बदमाशों का डिजिटल डेटा तैयार कर लिया है।
यह तकनीक न केवल स्थानीय पुलिस बल्कि सीबीआई, एनआईए और डीआरआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों के लिए भी मददगार साबित होगी, क्योंकि वे एक सिंगल क्लिक से किसी भी संदिग्ध का रिकॉर्ड खंगाल सकेंगी।
पुलिस अब अपराधियों की पहचान के लिए सिर्फ पुराने रिकॉर्ड्स या गवाहों पर निर्भर नहीं रहेगी। इस नए सिस्टम के तहत बदमाशों का बायोमेट्रिक डेटा कई स्तरों पर सुरक्षित किया जा रहा है। इसमें अपराधी के फिंगरप्रिंट और हथेलियों के निशान तो लिए ही जा रहे हैं, साथ ही आंखों की पुतलियों (रेटिना स्कैन) को भी रिकॉर्ड किया जा रहा है।
सबसे खास बात यह है कि अब अपराधियों के चलने के ढंग यानी ‘गैट पैटर्न’ का भी वीडियो बनाकर सुरक्षित रखा जा रहा है। अगर कोई अपराधी भविष्य में अपना चेहरा छिपाकर भी कहीं से निकलता है, तो उसके चलने के अंदाज से पुलिस उसे आसानी से पहचान लेगी।
इतना ही नहीं, इस प्रोफाइल में अपराधी का डीएनए डेटा और चेहरे की बनावट का सूक्ष्म विवरण भी शामिल होगा। चेहरे के विश्लेषण में आंखों और कानों के बीच की सटीक दूरी का माप लिया जाता है, जिससे फेशियल रिकग्निशन तकनीक और भी सटीक हो जाती है।
अपराधी को हर संभव कोण से पहचानने के लिए उसकी 12 अलग-अलग एंगल से फोटो ली जा रही है। यह मल्टी-लेयर डेटा स्टोरेज सिस्टम जांच प्रक्रिया को बेहद तेज और असरदार बना देगा।
इस प्रोजेक्ट को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए जिला स्तर पर 70 एमसीयू इकाइयां स्थापित की जा चुकी हैं। योजना के अगले चरण में प्रदेश के 1111 थानों में से 450 थानों में जल्द ही यह मशीनें लगा दी जाएंगी। केवल पुलिस थाने ही नहीं, बल्कि जेलों को भी इस सिस्टम से जोड़ा जा रहा है।
प्रदेश की 125 जेलों में यूनिट लगाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, ताकि सजायाफ्ता और विचाराधीन कैदियों का एक सटीक नेशनल डेटा बैंक तैयार किया जा सके। इससे जेल प्रबंधन में सुधार होगा और कैदियों की पहचान से जुड़ी गड़बड़ियों पर पूरी तरह रोक लग जाएगी।
जब यह पूरा सिस्टम सक्रिय हो जाएगा, तो भीड़भाड़ वाले इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों के जरिए संदिग्धों को ट्रैक करना आसान होगा। अगर कोई पुराना अपराधी किसी सार्वजनिक स्थल पर घूमता पाया जाता है, तो फेशियल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर तुरंत पुलिस को अलर्ट कर देगा। इससे राज्यों के बीच जानकारी साझा करने में लगने वाला समय बचेगा और अंतर-राज्यीय गैंग्स को पकड़ना काफी सरल हो जाएगा।
मध्य प्रदेश पुलिस अपनी आंतरिक सुरक्षा को भविष्य की चुनौतियों के हिसाब से तैयार कर रही है। हाल ही में नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG) के सहयोग से एक विशेष ट्रेनिंग प्रोग्राम का समापन हुआ है।
यह प्रशिक्षण 7 अप्रैल से 4 मई 2026 तक भोपाल स्थित स्पेशल ब्रांच ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में आयोजित किया गया। इसमें पुलिस के चुनिंदा अधिकारियों को ड्रोन हमलों जैसे आधुनिक खतरों से निपटने के गुर सिखाए गए हैं।
पुलिस महानिदेशक श्री कैलाश मकवाणा ने इस मौके पर स्पष्ट किया कि आज के दौर में सुरक्षा चुनौतियां बदल रही हैं। ड्रोन हमले और साइबर क्राइम जैसे नए खतरों से निपटने के लिए पुलिस का तकनीकी रूप से सक्षम होना अनिवार्य है।
केंद्रीय गृह मंत्री की पहल पर हुए इस समझौते (MoU) के बाद अब एमपी पुलिस और एनएसजी मिलकर काम कर रहे हैं। यह डिजिटल प्रोफाइलिंग और आधुनिक ट्रेनिंग का संगम प्रदेश को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।













