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संकट में ‘टाइगर स्टेट’: कान्हा में 6 दिन के भीतर 3 नन्हे बाघों की मौत से मचा हड़कंप

  • कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन टी-141 के तीन शावकों की छह दिनों के भीतर मौत हो गई।
  • शुरुआती जांच में दो शावकों की मौत की वजह भुखमरी और कमजोरी बताई जा रही है।
  • मध्यप्रदेश में साल 2026 के पहले चार महीनों में अब तक 23 बाघों की जान जा चुकी है।
  • पिछले छह सालों में राज्य ने कुल 269 बाघों को खोया है, जो एक चिंताजनक आंकड़ा है।
  • वन विभाग अब चौथे शावक को बचाने और मौतों के असली कारणों का पता लगाने में जुटा है।

Kanha Tiger Reserve latest news : मध्यप्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। यहाँ महज छह दिनों के भीतर बाघिन टी-141 के तीन नन्हे शावकों की मौत हो गई है। अमाही क्षेत्र की इस बाघिन के तीसरे शावक का शव शनिवार शाम को सरही जोन में बरामद किया गया।

इससे पहले 21 और 24 अप्रैल को भी इसी बाघिन के दो अन्य शावकों ने दम तोड़ दिया था। वन विभाग की शुरुआती जांच में दो शावकों की मौत का कारण भुखमरी बताया जा रहा है, जबकि तीसरे शावक के शव को विस्तृत जांच के लिए जबलपुर की फोरेंसिक लैब भेजा गया है। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब प्रदेश अपनी ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान को बचाने के लिए जूझ रहा है।

छह दिनों में उजड़ गई बाघिन की दुनिया

कान्हा टाइगर रिजर्व के अधिकारियों के लिए पिछला एक हफ्ता किसी बुरे सपने जैसा रहा है। बाघिन टी-141 के शावकों की एक-एक कर हो रही मौत ने पार्क प्रबंधन की निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। शनिवार को जिस तीसरे शावक का शव मिला, वह काफी कमजोर स्थिति में था।

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वन विभाग की टीम अब इस बात की गहराई से पड़ताल कर रही है कि आखिर बाघिन अपने बच्चों को खाना खिलाने में असमर्थ क्यों रही या क्या क्षेत्र में शिकार की कमी थी। इस बीच, चौथे शावक की सुरक्षा को लेकर भी टीम अलर्ट पर है, क्योंकि उसकी जान पर भी खतरा मंडरा रहा है।

मौत के आंकड़ों ने बढ़ाई टेंशन

मध्यप्रदेश में बाघों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। साल 2026 के शुरुआती चार महीनों में ही प्रदेश 23 बाघों को खो चुका है। अगर पिछले कुछ सालों के रिकॉर्ड पर नजर डालें, तो हालात और भी डरावने नजर आते हैं। साल 2021 में जहाँ 34 बाघों की मौत हुई थी, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 55 तक पहुंच गया।

पिछले छह वर्षों में कुल 269 बाघों की जान जा चुकी है। इन मौतों के पीछे आपसी संघर्ष, बीमारी और प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ कुछ संदिग्ध परिस्थितियां भी जिम्मेदार रही हैं। अकेले अप्रैल के महीने में कान्हा और उसके आसपास के इलाकों में चार बाघों की मौत दर्ज की जा चुकी है।

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क्या सुरक्षित नहीं हैं हमारे जंगल?

मध्यप्रदेश में फिलहाल 785 बाघ हैं, जो इसे देश में पहले पायदान पर रखते हैं। लेकिन जिस रफ्तार से बाघों की संख्या कम हो रही है, उससे संरक्षण के दावों पर सवाल उठना लाजिमी है। वन विभाग का कहना है कि वे नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) के नियमों का सख्ती से पालन कर रहे हैं और हर मौत की बारीकी से जांच की जा रही है। हालांकि, वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जांच काफी नहीं है; मैदानी स्तर पर गश्त बढ़ाने और बाघों के पर्यावास (habitat) को सुरक्षित करने के लिए और भी कड़े कदम उठाने की जरूरत है।

चौथे शावक को बचाने की चुनौती

बाघिन टी-141 के परिवार में अब केवल एक शावक बचा है। वन विभाग की पूरी कोशिश है कि इस आखिरी शावक को हर हाल में सुरक्षित रखा जाए। इसके लिए सरही और अमाही क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है। आने वाले कुछ दिन मध्यप्रदेश के वन्यजीव प्रबंधन के लिए अग्निपरीक्षा जैसे होंगे। यदि समय रहते इन मौतों के सही कारणों का पता लगाकर समाधान नहीं निकाला गया, तो ‘टाइगर स्टेट’ का गौरवशाली तमगा हाथ से निकल सकता है।

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Alok Singh

मेरा नाम आलोक सिंह है मैं भगवान नरसिंह की नगरी नरसिंहपुर से हूं ।और पत्रकारिता में मास्टर डिग्री हासिल करने के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में आया था ।मुझे पत्रकारिता मैं इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया का 20 वर्ष का अनुभव है खबरों को प्रमाणिकता के साथ लिखने के हुनर में माहिर हूं।

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