मध्य प्रदेश में फिर खुलेंगे आरटीओ चेक पोस्ट: हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को दिया 30 दिन का सख्त अल्टीमेटम
परिवहन विभाग की वादाखिलाफी पर अदालत सख्त, भारी वाहनों की निगरानी और सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी बॉर्डर नाकों को दोबारा शुरू करने का आदेश।
MP RTO Check Post News : मध्य प्रदेश की सड़कों पर भारी वाहनों की अनियंत्रित रफ्तार और सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर लगाम लगाने के लिए जबलपुर स्थित हाई कोर्ट ने एक बड़ा और निर्णायक फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार और परिवहन विभाग को स्पष्ट आदेश दिया है कि अगले 30 दिनों के भीतर प्रदेश की सभी आरटीओ (RTO) चेक पोस्ट दोबारा सक्रिय की जाएं। यह आदेश उस समय आया है जब राज्य में सड़क हादसों और ओवरलोडिंग की समस्याओं को लेकर चिंताएं बढ़ रही थीं।
न्यायमूर्ति की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता रजनीश त्रिपाठी द्वारा दायर की गई अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए। कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि परिवहन विभाग ने पहले अदालत में चेक पोस्ट संचालन को लेकर अंडरटेकिंग (वचनपत्र) दी थी, लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इन नाकों को बंद रखा गया। हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब राज्य सरकार को एक महीने के भीतर अपनी पूरी व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाना होगा।
नियमों की अनदेखी और सुरक्षा का सवाल
मध्य प्रदेश सरकार ने 30 जून 2024 को एक प्रशासनिक निर्णय लेते हुए राज्य की सभी आरटीओ चेक पोस्ट को बंद कर दिया था। उस समय सरकार का मुख्य तर्क यह था कि सीमावर्ती इलाकों में वाहनों की लंबी कतारों को खत्म किया जाए और भ्रष्टाचार की संभावनाओं को न्यूनतम स्तर पर लाया जाए। सरकार का उद्देश्य परिवहन को सुगम बनाना और आधुनिक तकनीक के माध्यम से निगरानी करना था।
हालांकि, इस फैसले के बाद से ही राज्य की सीमाओं से गुजरने वाले भारी वाहनों की जांच का काम लगभग ठप हो गया था। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि चेक पोस्ट बंद होने से फिटनेस सर्टिफिकेट, परमिट और भार क्षमता की जांच नहीं हो पा रही है। बिना उचित जांच के सड़कों पर दौड़ते भारी वाहन न केवल नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, बल्कि गंभीर सड़क हादसों का कारण भी बन रहे हैं।
कोर्ट में परिवहन विभाग की खिंचाई
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने विभाग के पिछले रवैये पर सवाल उठाए। याचिका में दलील दी गई थी कि परिवहन विभाग ने पहले अदालत को आश्वस्त किया था कि सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा और जांच के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं सुदृढ़ की जाएंगी। इसके बावजूद, हकीकत में निगरानी तंत्र कमजोर पड़ गया।
अदालत ने इसे सीधे तौर पर ‘अवमानना’ का मामला माना, क्योंकि सरकारी विभाग अपने ही दिए गए वचन का पालन करने में विफल रहा। हाई कोर्ट ने साफ किया कि जनता की सुरक्षा और नियमों का अनुपालन सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। चेक पोस्ट केवल राजस्व वसूली का केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे वाहनों की तकनीकी स्थिति और कानूनी दस्तावेजों के सत्यापन का मुख्य जरिया भी हैं।
सरकार के सामने 30 दिनों की चुनौती
हाई कोर्ट के इस आदेश ने राज्य सरकार के सामने एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती पेश कर दी है। पिछले साल जून से बंद पड़ी चेक पोस्ट को दोबारा शुरू करने के लिए भारी मैनपावर और संसाधनों की आवश्यकता होगी। नाकों पर तैनात होने वाले अमले को फिर से व्यवस्थित करना, तकनीकी बुनियादी ढांचे को सक्रिय करना और सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार करना अब सरकार की प्राथमिकता होगी।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि सरकार इस 30 दिन की समय सीमा के भीतर आदेश का पालन नहीं करती है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ और भी सख्त कार्रवाई की जा सकती है। यह फैसला प्रदेश की परिवहन नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाने वाला साबित होगा। अब देखना यह है कि मोहन यादव सरकार इस कानूनी बाध्यता और अपनी ‘ई-चेकपोस्ट’ की योजना के बीच कैसे तालमेल बैठाती है।












